80-20 Rule For Efficiency

Written by Sneh Desai on January 12, 2018

Rule For Efficiency


Life is not a piece of cake –

it has many ups and downs and requires a lot of courage to keep facing each difficulty with the same vigour, and there is NO TIME. However, what all of us need is to be able to have a dynamic approach to this uncertainty of Life and use it for being more efficient – thereby increasing our level of productivity using the least possible time. Thus, the 80/20 Rule – formulated by Vilfredo Pareto in 1906 and interpreted by many experts around the world to help change our lives. At the first instant the 80/20 rule seems extremely mathematical, so in order to understand its larger implications, let’s delve deeper:-

Understanding the 80/20 Rule:

In simplistic term, 80% of your outcomes depend on merely 20% of your actions. It may sound absurd at first, but if you really think about it you’ll understand that a handful of activities done on a regular basis really define your mood and thus your happiness. As a realistic example consider this, 80% of your business runs successfully due to merely 20% of your clients. There are innumerable instances where we see the importance of this rule. However, let’s focus on how we can use this to increase our efficiency.

While setting goals –

When you list down your goals in life, there is only a handful which are critical to your success. Also, practically it is not possible for you to work on every goal simultaneously. But if you are able to recognize those few which can prove monumental, you are successfully applying the 80/20 rule.

Managing Workload –

No matter where you are working, chances are that you need no introduction to the pressures of mounting workload. We all battle through it. But have you ever wondered why you end up spending the most amount of your time in handling really small-scale activities, resulting in no plausible results? In place of such a practice, if you start using the 80/20 Rule, you may be able to identify the work that shall cut down the maximum workload and produce the greatest positive outcome.

Customer-Evaluation –

Where 80% of your work comes from 20% of your client-base, it gets easier to evaluate the business you are getting from them over a period of time. And in turn, it gets easier to identify how strong that collaboration is and whether it needs a reboot or replacement. When the 80/20 rule is in place, you can make these evaluations more regularly too; ensuring healthy customer relations.

Risk-Assessment –

While taking up a new project, risk must be weighed before you decide to venture in a full-fledged manner. But not every risk is significant. Make a list of the risks that pose the highest threats, and then assign your resources and risk-planning activities to those matters. Once they are attended to, you shall be able to make sound decisions.

To-Dos –

There are many items on our everyday to-do list and god knows we are never able to finish most of those tasks. What needs to change? Identify the activities corresponding to extremely important issues. Instead of wasting time by garnering false satisfaction in doing most tasks on the list resulting in no meaningful accomplishment, bring your focus on those few large ones that need your undivided attention for bringing about credible results.

Setting Priorities –

All of us, irrespective of our jobs, businesses or professions, and in most cases, even students know the cost of not being successfully able to set our priorities. The 80/20 rule forces us to see the ratio of input to output so easily that it can really help us in setting priorities, especially during testing times.
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Conclusion:

In the light of the above, people generally forget that they need to priorities important matters before trivial ones and NOT UNDER ANY CIRCUMSTANCES ignore the small matters at hand. It is just a method of choosing a few crucial activities before the bundle of mundane ones – hence, it does not imply that you let the remaining activities unattended.

कार्यकुशालता के लिए ८०-२० का नियम

जिन्दगी कोई बच्चों का खेल नहीं है –

उसमें बहुत सारे उतार चढाव होते हैं और हर मुसीबत का सामना हर बार धैर्य से करने के लिए हौसला चाहिए; और उस में समय नहीं होता| फिर भी हम सब को चाहिए की जिन्दगी के इस अस्थिर रूप की ओर उर्जस्वि रूप से बढ़ें और ज्यादा प्रभावशाली बनें – और उसके कारण हमारा उत्पादन स्तर कम से कम समय में बढाएं| अतः विल्फ्रेडो फरेरो ने १९०६ में बनाया हुआ यह ८०/२० का नियम जिसका दुनिया के कई निष्णातों ने समय समय पर अर्थघटन करके हमारी जिन्दगी को सरल बनाया| पहली नजर में यह ८०/२० का नियम अत्यधिक गणितीय लगता है, अतः बड़े स्तर पर इसका असर जानने–समझने के लिए, आओ और गहराई में उतरें और गहनता से सोचें:-

८०/२० के नियम को समझना:

सरल भाषा में कहा जाये तो आपकी ८०% सफलता केवल आपके २०% प्रयत्न पर निर्भर है| शुरू में यह सुनने में उटपटांग लगता है, लेकिन जब आप सही में इसके बारे में सोचेंगे तब आप समझ जायेंगे की हर रोज नियमित की जाने वाली कुछ प्रवृत्तियाँ ही आपकी मनोदशा सीमांकित करती हैं और फिर आपकी खुशी| वास्तविक उदहारण के तौर पर इसे समझें तो, आपके व्यापार का ८०% हिस्सा आपके २०% ग्राहकों की वजह से ही सफल है| ऐसे असंख्य दृष्टांत हैं जिनमें हम इस नियम का महत्त्व देख सकते हैं| फिर भी हम अपनी कार्यक्षमता बढाने के लिए इसका उपयोग कैसे कर सकते हैं इस बात पर ध्यान देते करते हैं|

लक्ष्य निश्चित करते समय –

जब आप जिन्दगी के लक्ष्यों की सूचि बनाते हैं तब, थोड़े से ही लक्ष्य ऐसे होते है जो आपकी सफलता के लिए अत्यावश्यक होते हैं| आपके लिए प्रत्येक लक्ष्य पर एक साथ काम करना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है| पर आप उनमें से जो भी अति महत्वपूर्ण साबित होने वाले हों उन्हें पहचान लें, तो आप ८०/२० के नियम का सफलता से उपयोग कर रहे हैं|

कार्यभार प्रबंध –

आप कहाँ काम करते हो उस से कोई फर्क नहीं पड़ता, आपको बढ़ते हुए कार्यभार के दबाव से परिचित कराने की जरुरत नहीं है| हम सब उसके साथ शुरू से अंत तक संघर्ष करते हैं| पर क्या आप ने कभी सोचा है कि आप अपना ज्यादातर वक्त छोटी छोटी बातों को सुलझाने में व्यतीत करते हैं, जिसका कोई प्रशंसनीय परिणाम नहीं आता? इस तरह से काम करने के बदले अगर आप ८०/२० के नियम का उपयोग करना चालू करते हैं, तो आप उस काम को पहचान पाओगे जो आपके महत्तम कार्यभार को कम करता है और अधिकतम सकारात्मक परिणाम उत्पन्न करता है|

ग्राहकों का मुल्यांकन –

जहाँ आपका ८०% काम आपके २०% ग्राहकों से आता है, वहाँ एक समय अवधि में उनसे मिलने वाले कारोबार का मुल्यांकन करना और भी सरल हो जाता है| और इसके चलते, यह भी जानना सरल हो जाता है की आपका साथ कितना मजबूत है और उसे फिर से दृढ करने की या बदलने की जरुरत है या नहीं| जब ८०/२० का नियम अपने नियत स्थान में होता है तब आप यह मुल्यांकन और भी नियमित रूप से कर सकते हो; जिससे ग्राहकों के साथ स्वस्थ सम्बन्ध बना रह सके|

खतरों का आंकलन –

जब भी आप कोई नया प्रकल्प शुरू करते हैं तब, उसमें पूरी तरह से जुड़ने से पहेले जोखिम के बारे में ज़रूर जान लेना चाहिए| लेकिन सारे खतरे सार्थक नहीं होते| खतरों की और उनसे होने वाले नुकसान की सूचि बनाएँ, और फिर अपने संसाधनों तथा जोखिम-नियोजक कार्यों को उन बातों के लिए निर्धारित कीजिये| एक बार उन्हें कैसे हल करना यह तय हो जाये तो आप अच्छे निर्णय लेने में सक्षम हो जायेंगे|

करने के काम की सूचि –

हमारी हर रोज़ करने के काम की सूचि में कई कार्य होते हैं और भगवान जानता है की उन में से ज्यादातर काम हम पुरे नहीं कर पाते| क्या बदलने की जरुरत है? अत्यधिक महत्वपूर्ण मसलों से सुसंगत कार्यों को पहचानिए| सूचि में लिखे ज्यादातर कार्यों को पूरा करके कोई अर्थपूर्ण उपलब्धि न पाने में समय व्यर्थ गवाँ कर कृत्रिम संतोष मानने के बजाय, उन थोड़े, मगर ज्यादा महत्वपूर्ण एवं बड़े कामो में ध्यान केन्द्रित करके विश्वसनीय परिणाम प्राप्त करें|

अग्रताका समायोजन –

हम सब, हमारी नौकरियाँ जो भी हो, व्यापार, या ज्यादातर किस्सों में विद्यार्थी भी जानते है की कार्यों की अग्रता का सफल आयोजन ना करने की कीमत क्या होती है| यह ८०/२० का नियम हमें आगत-उत्पाद का अनुपात इतना आसानी से देखने पर मजबूर करता है कि यह हमें सही में अपनी अग्रताएँ निश्चित करने में मदद कर सकता हैं, ख़ास करके कसौटी के समय में|
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