Be Less Possessive: How To Let It Go

Written by Sneh Desai on February 18, 2017

Be Less Possessive How To Let It Go


“If you let go a little, you will have a little peace. If you let go a lot, you will have a lot of peace.”
-Ajahn Chah

Letting go is a tricky concept. Especially if you are looking for peace and positive mental stimulation, it is a hard trick to master. It needs constant upkeep and is most necessary to feel liberated in the truest sense of the word. However, one of the hardest things to let go of, for most people, are material possessions. Everyone needs to practice not being attached and generally the starting point for it is to let go of material possessions. Too much attachment curbs our mental freedom and is more of a burden than one would wish to carry.

Before we go into understanding how to let it go, we need to understand why our possessions are so dear to us:

  1. Humans are emotional beings. We have feelings and memories tugged onto the things we own; especially gifts. It carries a huge amount of sentimental value to us before anything else.
  2. We think about the future, and a LOT. We feel we might not be able to afford what we have now. We get so caught up in that web of negativity that we actually forget that what we own now might actually become redundant.
  3. Monetary value of our possessions sometimes hinders our feelings of wanting to let go. The opportunity cost of our money is sometimes so high that we try not to regret it by holding on to what we have.
  4. We love thinking that we have more than what we require (or actually need!).
  5. We sometimes get really insecure about ourselves and try to find solace in material possessions.

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It is very evident from the above that our behaviour and bond with our possessions can really disrupt us from adapting changes in our lives. It can substantially limit our personal growth. However what we don’t reckon is that it is our choice. It is in our hands to place importance or remove it from things that pose constraint onto our lives!

There are numerous ways to handle this situation:

    1. Determine what you really need from life; determine your goals. If what you want is peace, happiness and contentment letting go of things that are binding yourself from being YOU is the first step forward. Know its importance and assume responsibility towards it. Stop playing the victim to the circumstances you are facing and reign over your life. It needs constant motivation, but if you have your priorities sorted, you will persist.
    2. Prioritize things that are adding value to your life over those that are proving to be redundant. Just because you have it does not mean you need it. Spare burdening yourself.
    3. To be present is the future! Focus on now without letting the fear of the uncertain future affect you. You know why? Because no matter what you try to do, the future will remain uncertain. That’s the beauty of it. But what is in our hands is that we can control our present and live fully in it to make efficient decisions. Living in the present in itself seems so gratifying that it takes away the unhealthy attention from missed opportunities, our inhibitions and the fears of the unknown; thereby automatically creating a sense of detachment from our possessions.

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  1. The backbone of our inability to let go lies in the fact that we constantly take things for granted. We become so used to what we have (because we have had it for most of our lives) that we take it for granted and parting from something of that stature becomes almost impossible. Value what you already have so that it fills the void of wanting to stack more things unnecessarily.
  2. It seems great to have more than necessary; but having a few good things is so much better than having a lot of things. Quality is more important than quantity. Enjoy the little things in life without feeling the need to own it. Look for experiences rather than objects and learn to practice contentment with less. It really helps in cutting off the emotional ties with your possessions and makes you learn the value of what really matters in life!

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“यदि आप थोडा जाने देते हैं, तो आपको थोड़ी शांति मिलेगी| यदि आप ज्यादा जाने देते हैं, तो आपको ज्यादा शांति मिलेगी|

– अजान चाह

जाने देना या छोड़ देना एक पेचीदा मसला है| खास करके जब आप शांति व हकारात्मक दिमागी प्रोत्साहन ढूंढ रहे हों, तबइस करामात में प्रभुत्व पाना बड़ा ही कठिन होता है|इसके लिए लगातारमरम्मत(प्रयास) की आवश्यकता होती है और ‘आझादी’ के सही माइने समझने के लिए यह बहुत ज़रूरी भी है| फिर भी, ज्यादातर लोगों के लिए, अपनेभौतिक वस्तुओं को जाने देना सबसे ज्यादामुश्किल होता है| हर एक व्यक्ति को ‘आसक्त न होने’ के प्रयत्न करने चाहिए औरइसकीशुरुवात अपने भौतिक वस्तुओं को जाने देने से करनी चाहिए| बहुत ज्यादा लगाव हमारे दिमागी आझादी में बाधा डालता है और हम उठाना चाहें इससे कई गुना ज्यादा का बोझ बन जाता है|

उन्हेंजाने देना सीखने से पहले, हमें यह समझ लेना चाहिए कि अपनी चीज़ें आखिर कर अपने को क्यों इतनी प्यारी होती हैं:

१. आदमी जज्बाती प्राणी है| हम जिन चीजों कोपा लेते हैं, खास करके तोहफे, उनके साथ हमारी कई सारी भावनाएं और यादें भी जुड़ जाती हैं|हर एक चीज़की, किसी दूसरी तरह की कीमत से पहले, एक बड़ी ऊंची भावनात्मक कीमत होती है|
२. हम भविष्य के बारे में सोचते हैं, और बहुत ज्यादा सोचते हैं| हमें लगता है कि आज जो हमारे पास है उसे हम शायद ही फिर से खरीदनेके काबिल बन सकेंगे| हम इस नकारात्मकता के मायाजाल में इतनी हद तक उलझ जाते हैं कि हमभूल ही जाते हैं कि आज जो हमारे पास है वह कल शायद बेकार(अनावश्यक) हो सकता है|

३. अपनी वस्तु का मौद्रिक मूल्य कभी-कभी हमारे ‘जाने देने’ की भावना में बाधा बन जाता है| कई बार हमारी वस्तु का उपयुक्तता मूल्य इतना ज्यादा होता है कि हम उसे पकडे रख कर उसकी खरीद पर न पछताने की कोशिश करते हैं|

४. हमारे पास ज़रुरत (या चाहत)से ज्यादा है ऐसा सोचना हमें बहुत पसंद है!

५. कभी-कभी हम खुद को लेकर बड़ा असुरक्षित महसूस करते हैं और फिर हम अपनी भौतिक वस्तुओं में तसल्ली खोजते हैं|

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उपरोक्त बातों से यह ज़ाहिर है की अपनी वस्तुओं से अपना लगाव व अपना ऐसा व्यवहार हमेंजीवन में किसी भी प्रकार का बदलाव लाने में विघ्न डालते हैं| यह हमारी व्यक्तिगत विकास को काफी हद तक सीमित कर सकते हैं| हालाँकिहम भूल जाते हैं कि यह केवल हमारी मर्ज़ी है| जो वस्तुएँ हमारे जीवन में बाधा डालें उन वस्तुओं कोमहत्व देना या ना देना केवल हमारे ही हाथों में है|

इसपरिस्थिति का सामना कई तरह से किया जा सकता है:

१. यह तय कर लो कि आपको जिंदगी से सचमुच क्या चाहिए, अपने लक्ष्य तय कर लीजिये| यदि आप शांति, सुख, व संतोष चाहते हैं तो ऐसी चीज़ों को छोड़ देना जो आपको खुद बनने से रोक रही हैं, आपका पहला कदम होना चाहिए| उसकामहत्त्व पहचानिए और उसके लिए ज़िम्मेदार बनिए| ‘हालात का मारा’ बनना बंद कीजिये और अपने जीवन के शहंशाह बनिए| इसके लिए सतत प्रेरणा की ज़रुरत होती है लेकिन यदि आपने अपनी प्राथमिकताएँबराबर छाँट ली हैं, तो आप इस प्रयास में लगे रहेंगे|

२. जो चीज़ें आपके जीवन का मूल्य बढ़ा रही हैं उन्हें प्राथमिकता दें नकि उन्हें जो बेकार साबित हो रही हैं|आपके पास कोई वस्तु है इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं है की उसकी आपको ज़रुरत है| खुद को लद्दू जानवरमत बनाओ|

३. वर्तमान में रहना ही सच्चा भविष्य है| अनिश्चित भविष्य के डर के प्रभाव को दूर करके

‘आज’ पर ध्यान दीजिये| मैं बताऊँ क्यों? क्योंकि आप जो चाहेकर लो, भविष्य तोहमेशा अनिश्चित ही रहेगा|वही उसकी सुन्दरता है| परन्तु हमारे हाथ में यह है कि हम अपने

वर्तमान पर काबू रखें और उसी में पूरी तरह से जीयें व योग्य निश्चय लें| वर्तमान में जीना अपने आप में इतना सुखद होता है कि वह खोए हुए अवसरों से, हमारेनिषेधों पर से, व अज्ञात के भय पर से हमारा असाधारण ध्यान हटा लेता है; जिससे की इन सब वस्तुओं से अपने आप ही एकअनासक्ति का एहसास पैदा हो जाता है|

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४. हमारे जाने देने की अक्षमता कीसारी निर्भाता इस मुद्दे पर टिकी हुई है कि हम हर बार चीज़ों का सही मूल्य नहीं समझते|जो कुछ हमारे पास है उसकी हमें इतनी आदत हो जाती है (क्योंकि यह सारी ज़िंदगी हमारे पास था) कि हमें लगने लगता है कि हम उसके बगौर जी ही नहीं सकेंगे और फिर ऐसी वस्तु से जुदा होना (या ऐसी वस्तु को छोड़ देना) करीबन नामुमकिन हो जाता है| जो आपके पास है उसकी सही कीमत पहचानकर उसे सराहिये जिससे आपके अंदर का खालीपन, जो आप नई-नई चीज़ों का बेकारसंग्रह करके भरना चाहते हो, पूरी तरह से नष्ट हो जायेगा|

५. ज़रुरत से ज्यादा होना बहुत अच्छा तो लगता है; परन्तु थोडीसी मगर उत्कृष्ट वस्तुएँ होना उससे भी बेहतर है| गुणवत्तासंख्या(तादाद) से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है| जीवन की छोटी-छोटी खुशियों का पूरा आनंद उठाओ; औरहर चीज़ को पाने की चाह मत रखो| अनुभवों को समेटो नकि वस्तुओं को और कम में संतोष मानना सीखो| इससेआपको अपनी वस्तुओं के भावात्मक बन्धनों से मुक्ति मिलने में काफी सहायता होगी और आपके जीवन में जिसकी सचमुच ज़रुरत है ऐसी वस्तुओं का मूल्य आप पहचानने लगेंगे|

अपने लक्क्ष्य निश्चित(तय)करें

ज़रूरतों को चाहतों से अधिक प्राथमिकता दें

वर्तमान में जीयें

वस्तुओं का सही मूल्य पहचानें / किसी भी वस्तु की आदत नहोने दें

संतुष्ट होना सीखें

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