How Comparison Can Damage Your Brain

Written by Sneh Desai on December 29, 2018

How comparison can damage your Brain




This post is for all those who at some point in their lives have stood second and were made to feel bad. Where does this come from? From comparisons. Why couldn’t you come first? Well, don’t bother to answer. You are first in your own right. Today we are going to talk about how comparisons damage, not just your self-respect, but also your brain! It is killing your brain cells, and you might as well realize it now!

Drawing comparisons is the easiest thing to do. You look at two good things and pin it against each other and get no new conclusions. Your brain should be doing something innovative and creative, but instead, it is stuck in making comparisons! Whether you realize it or not, but such comparisons will only make you unhappy. You will never be good enough! It is a toxic behavior which will constantly nag your mind. Soon, subconsciously, you will begin to feel like you were never good enough! How will your brain ever generate new ideas if you keep feeding it such negativity? And how will you see your life change? What you think is who you are. It is simple; thoughts become things. If you feed your mind negativity, what else will your life manifest but unfavorable circumstances? This is the predominant thing we discuss during my FREE ‘Change Your Life’ seminar.

Here, it is important to mention that being competitive & being comparative are two different things altogether. Competitive people learn from others’ failures or successes. They don’t compare how different their life would be with/without someone else’s success or failure. Comparative people tend to feed their brain with comparisons that lead to delusions. They lose sight of what is essential in life and begin to chase perfectionism. With time, this leads to stress & anxiety and a sincere lack of confidence in your own abilities. Soon, despite full capabilities, you will sink lower in life and never seek new opportunities for yourself.

Imagine your brain to be like a piece of machinery. Machines need to be well-oiled & get regular maintenance for proper functioning. If you keep using machines endlessly & tirelessly, it will give up well before it should. Incessant comparing does the same to your brain. It tires it down and snatches away room for improvement.

Soon comparison becomes obsessive. It leads you to feel jealous of everyone around you. You turn your friends & allies against you. Soon you stop making efforts for betterment. And this can happen over time without slightest of realizations. Now, the question is – Do you want to stall your life’s progress?

In short, comparing yourself with others is like self-destruction. You are purposely putting yourself through emotional damage which is affecting your brain, thoughts & thus your life. Even the ones who are best at what they do sometimes feel like they are inadequate. But they do not stop making progress in life. And it is important to understand that the ones who are best in their respective fields are so because of many other aspects that you may be unaware about.

In case you are so habituated with making comparisons, do it for further improvement. How much did they work every day? What kind of sacrifices did they make for becoming number 1? What kind of obstacles did they face & how did they overcome them? What are their strengths and weaknesses? How are they continuously honing their skills?

There is always a positive side to every negative habit. You just need to know how to make the switch! You can watch my live recorded workshop in ‘Winning Habits’ DVD and learn how to shift your habits. Hope this discussion throws enough light for you to stop making comparisons. Instead, I hope you learn and are motivated to see others succeed in life!

कैसे किसी के साथ तुलना करना आपके मस्तिष्क को नुकसान पहुंचा सकता है

यह पोस्ट उन सभी के लिए है जो अपने जीवन में कभी तो दूसरे स्थान पर रहे हैं और इस कारण उन्हें बुरा महसूस कराया गया था। ऐसा व्यवहार कहां से आता है? तुलना करने से। हमसे पूछा जाता है कि आप प्रथम क्यों नहीं आ सकते थे? खैर, ऐसे प्रश्नों का जवाब देना जरुरी नहीं है। आप अपने आप में तो प्रथम हैं ही। आज हम इस बात पर चर्चा करने जा रहे हैं कि तुलना करने से कैसे न केवल आपके आत्म सम्मान, बल्कि आपके मस्तिष्क को भी नुकसान पहुंचता है! यह आपके मस्तिष्क की कोशिकाओं को मार रहा है और आप इसे अब भी महसूस कर सकते हैं!

तुलना करना सबसे आसान काम है। आप दो अच्छी चीजों को देखते हैं और इसे एक दूसरे के खिलाफ रखते हैं और कोई नया निष्कर्ष नहीं निकलता। आपका मस्तिष्क कुछ नया और रचनात्मक करना चाहिए, लेकिन इसके बजाय, यह तुलना करने में फंस गया है! चाहे आप इसे महसूस करें या नहीं, लेकिन ऐसी तुलना केवल आपको दुखी ही करेगी। आप कभी भी खुश नहीं होंगे! यह ऐसा बुरा व्यवहार है जो लगातार आपके दिमाग को सतायेगा। जल्द ही, मन में, आप महसूस करना शुरू कर देंगे कि आप कभी भी अच्छे नहीं थे! यदि आप इस तरह की नकारात्मकता जारी रखते हैं तो आपका मस्तिष्क कभी भी नए विचार कैसे उत्पन्न करेगा? और आप अपने जीवन में परिवर्तन कैसे देखेंगे? जो आप सोचते हैं वैसे ही बनते है। यह समझना आसान है; विचारों से ही चीज़ें बन जाती हैं। यदि आप अपने दिमाग में नकारात्मक विचार रखते हैं, तो आपके जीवन में प्रतिकूल परिस्थितियों के आलावा और क्या प्रकट होगा? यह महत्वपूर्ण विषय है जिसे हम अपने मुफ़्त ‘चेंज योर लाइफ’ संगोष्ठी के दौरान चर्चा करते हैं।

यहां, यह उल्लेख करना महत्वपूर्ण है कि प्रतिस्पर्धी होना और तुलनात्मक होना यह पूरी तरह से दो अलग-अलग चीजें हैं। प्रतिस्पर्धी लोग दूसरों की असफलताओं या सफलताओं से सीखते हैं। वे तुलना नहीं करते कि उनका जीवन किसी और की सफलता या विफलता के बिना कितना अलग होगा। तुलनात्मक लोग अपने दिमाग में दूसरों के साथ तुलना करते रहते हैं, जो और कुछ नहीं बल्कि सिर्फ भ्रम पैदा करता हैं। वे जीवन की आवश्यक चीज़ों को देखना भूल जाते हैं और पूर्णता (परफेक्शन) का पीछा करना शुरू करते हैं। धीरे-धीरे, इससे तनाव और चिंता बढ़ती है और खुद की क्षमताओं में आत्मविश्वास की गंभीर कमी आती है। जल्द ही, सारी क्षमताओं के बावजूद, आप जीवन में निचे गिरते जाते हैं और अपने लिए कभी भी नए अवसर नहीं तलाशते।

कल्पना करें कि आपका मस्तिष्क मशीनरी के टुकड़ों की तरह बना है। मशीनों को अच्छी तरह से तेल लगाने और सही ढ़ंग से कार्य करने के लिए नियमित रखरखाव की आवश्यकता होती है। यदि आप मशीनों का बिना रुके लगातार उपयोग करते रहते हैं, तो समय से पहले ही वह काम करना बंद कर देगा। लगातार तुलना करना भी आपके दिमाग को वैसा ही बनाती है। यह इसे थका देती है और सुधार के अवसरों को छीन लेती है।

जल्द ही तुलना करना एक जुनून बन जाता है। यह आपको अपने आस-पास के हर किसी के साथ ईर्ष्या महसूस करने पर मजबूर कर देता है। यह आपको अपने दोस्तों और सहयोगियों को आपके खिलाफ करता हैं। जल्द ही आप सुधार के लिए प्रयास करना बंद कर देते है। यह कब हो जायेगा आपको पता भी नहीं चलेगा। अब, सवाल यह है – क्या आप अपनी जिंदगी में प्रगति को रोकना चाहते हैं?

संक्षेप में, दूसरों के साथ तुलना करना स्वयं का विनाश करने की तरह है। आप जानबूझकर खुद का भावनात्मक नुकसान कर रहे हैं जो आपके मस्तिष्क, विचारों और अंत में आपके जीवन को प्रभावित कर रहा है। यहां तक कि जो बढ़िया कार्य करते हैं, वे भी कभी-कभी ऐसा महसूस करते हैं कि वे पूरी तरह से समर्थ नहीं हैं। लेकिन वे जीवन में प्रगति करना बंद नहीं करते। यह समझना महत्वपूर्ण है कि जो लोग अपने संबंधित क्षेत्रों में सर्वश्रेष्ठ हैं वे ऐसे कई अन्य पहलुओं के कारण हैं जिनके बारे में आप अनजान हो सकते हैं।

यदि आपको तुलना करने की इतनी आदत हैं, तो आप इसे और सुधार करने के लिए उपयोग में लाये। वे हर दिन कितना काम करते थे? नंबर 1 बनने के लिए उन्होंने किस तरह के बलिदान किए? उन्होंने किस तरह की बाधाओं का सामना किया और उन्होंने उन्हें कैसे दूर किया? उनकी ताकत और कमजोरियां क्या हैं? वे लगातार अपने कौशल को कैसे बढ़ा रहे हैं? इत्यादि…

हर नकारात्मक आदत का हमेशा सकारात्मक पक्ष होता है। आपको सिर्फ यह जानने की जरूरत है कि कैसे बदले! आप ‘विनिंग हैबिट्स’ DVD डीवीडी में मेरी लाइव रिकॉर्ड की गई कार्यशाला देख सकते हैं और अपनी आदतों को कैसे बदल सकते हैं यह सीख सकते हैं। आशा है कि यह चर्चा तुलना करने से रोकने के लिए आपके लिए उपयोगी होगी। मुझे उम्मीद है कि आप सीखेंगे और दूसरों को जीवन में सफल होते देख खुद भी प्रेरित होंगे!

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