RELATIONSHIP OR ARGUMENT? – What Do You Want?

Written by Sneh Desai on December 15, 2017

Relationship or Argument


The biggest dilemma anyone ever faces in any kind of a relationship is related to ego management during an argument – should you feed the other’s ego to temporarily stop the augmenting of a fight or should you bloat your own just for the sake of winning an argument? Either way the one thing that is inescapable is that each party ends up getting hurt in one way or another; even though the hurt is not always put up for display. Hence the question – Relationship or Argument, which one do you want? In case your answer is the former, read on.

Choosing the relationship (in theory) right now over an argument does not mean that you will be infallible to the presence of arguments and disagreements in your relationships. They will be present, but what needs to change is your way of tackling it. This article is not a matter of making a choice in theory but to actually PRACTICALLY choose to see the larger picture over petty misdemeanours. After understanding this, our participants experience this breakthrough in their relationships in my signature event ‘Change Your Life’ Workshop.

The first thing that one needs to develop clarity over is that a fight is about a topic not about the person. Try to not take it personally but more importantly do not make the argument personal for the other person as well. Draw a line. It is not a bad thing to have disagreements but it is encouraged to see it as more of a debate than a personal attack. This is highly significant in handling professional engagements. Not everything can go according to your vision or plan, and what deters from this vision needs to be handled sensitively.

The aforesaid problem turns for the worse when you fight with a person close to you as opposed to a business associate. The closer a person the more personal the attack. The more personal the attack, the more vicious it gets. The more vicious it gets, less are the chances of mitigation. In such a case, do not face the person head on. This does not mean that you need to defer it till a point that the relationship cannot be salvaged or till things become highly awkward. Face it but with a cooler head.

In order to cool down, learn to take a time-out. Take a fifteen minute (at the least) break from whatever you are doing. Be alone and away from other means of communication. In case during this time you are filled with negativity of any kind, let it out then and there. It will help you to not be so blunt in front of the other person when you face them, and also help you get some peace of mind.

Once you are calmer, contemplate about the kind of commitment you have towards the other person. If it is a professional one wherein you need to face the other person every day, then it is wiser to end things in a more amicable manner instead of ruining everything because chances are that you will have to continue maintaining communication lines with them to ensure a healthy working environment.

In case the commitment is really personal – like a family member or your significant other, the truth is that it will be ten times harder to reason with yourself than in case of a professional relationship; which is why you have to try ten times harder. However, even after the time-out and the cooling down if you are unable to reach for a consensus within yourself, try talking to a close friend before taking drastic steps. Sharing a problem makes it less of a burden and you can get a better point-of-view to take into consideration.

After you have done all of the above – seen the bigger picture, taken time out, calmed down and reasoned out either with yourself or with a friend – what is left is the ultimate face-off. If you have been diligent with the initial steps, being sensitive and accommodating should come to you rather easily.

Choose your words wisely, especially if you are dealing with a senior person. It is better to be sure than be sorry and sabotage important relationships. It is not always about who is right or wrong, it is more about how important the other person has been in making you who you are today! Learn to be forgiving for the greater good; the rewards of forgiveness are aplenty in the long-term! Treat people how you would like to be treated and put yourself in their shoes for a change.

If you wish to experience the highest level of love, happiness and harmony in your relationship, join my 4-days Camp ‘Ultimate Life’ where I spend one whole day on building exceptional relationships.

P.S.: Even after reading the above if you feel that being stubborn to feed your ego and winning is of more importance to you than someone else’s feelings, remember that a relationship is a two-way street. What you give can come right back at you when you least expect it, and more often than not it is a lot worse.


रिश्ता या बहस? – आपको क्या चाहिए?

लोग आप से कैसा व्यवहार करते हैं वह उनका कर्म है; आप कैसी प्रतिक्रिया देते हैं वह आपका|
– वेईन डायर

किसी भी सम्बन्ध में सबसे बड़ी समस्या जो हर एक के सामने आती है वह है बहस दरम्यान अपने अहंकार को संभालना – क्या आपने दुसरे के अहंकार की पुष्टि करनी चाहिए ताकि बात झगड़े की ओर बढ़ना कुछ समय के लिए रुक जाए या केवल बहस को जीतने के लिए क्या आपने अपने अहंकार को फुला लेना चाहिए? चाहे कुछ भी हो, यह बात तो तय है कि दोनों ही व्यक्ति एक या दूसरी तरह से दु:खी होते हैं, हालाँकि वह दु:ख हमेशा सामने दिखाई नहीं देता| इसीलिए यह प्रश्न – रिश्ता या बहस, आपको क्या चाहिए? यदि पहला शब्द आपका उत्तर है, तो आगे पढ़िए|

रिश्ते को (सिध्दांत के लिए) बहस से ऊपर मानकर, इस वक्त चुनना इस बात का प्रमाण नहीं है कि आपके रिश्तों में बहस तथा मतभेद के लिए कोई जगह ही नहीं है| वह जरूर हाज़िर होंगे, लेकिन जिस बात को बदलने की आवश्यकता है वह है आप उनका किस तरह से सामना करते हैं| यह लेख सैध्दान्तिक तरीके से चुनाव करने के बारे में नहीं है, परन्तु सही में, वास्तविक रूप से तुच्छ दुराचार से परे बड़े चित्र को देखने को और उसी को चुनने के बारे में है| यह बात सझने के बाद, मेरे चिन्हक कार्यक्रम ‘चेंज योर लाइफ’ वर्कशॉप में भाग लेने वाले लोग अपने रिश्तों में इस महत्वपूर्ण खोज का अनुभव करते हैं|

सबसे पहली बात जो समझ लेनी चाहिए वह यह है कि झगड़ा किसी विषय के बारे में होता है, व्यक्ति के बारे में नहीं| इसे व्यक्तिगत रूप से ना लेने की कोशिश करनी चाहिए और अधिक महत्त्व की बात यह है कि बहस को दुसरे व्यक्ति के लिए भी व्यक्तिगत ना बनाए| एक लकीर खींचें| मतभेद होना कोई बुरी बात नहीं है लेकिन यह ध्यान दें कि इसे केवल एक बहस के रूप में ही देखें ना कि व्यक्तिगत हमले के| यह व्यावसायिक अनुबंधों में बहुत ज्यादा आवश्यक है| हर बात आपके दृष्टिकोण या योजना के मुताबिक नहीं हो सकती, और जो इस दृष्टिकोण से अलग पड़ता है उसे भावात्मक रूप से संभालना होगा|

उपरोक्त समस्या तब बदतर बनती है जब आप अपने किसी व्यवसायिक सहकर्मी की जगह किसी प्रिय व्यक्ति से झगड़ते हो| जितना करीबी आदमी, उतना ही व्यक्तिगत हमला| जितना अधिक व्यक्तिगत हमला वह उतना ही अधिक खतरनाक बनता है| और जितना अधिक खतरनाक, उतने ही कम सुलह करने या होने के अवसर| ऐसी स्तिथि में व्यक्ति का सामना खुल कर ना करें| इसका यह अर्थ नहीं कि आप इसे इतना पीछे धकेलें कि किसी भी तरह सुलह मुमकिन ही ना हो या बता बहुत ही ज्यादा बिगड़ जाये| सामना कीजिये लेकिन ठंडे दिमाग से|

दिमाग ठंडा करना के लिए, कुछ विश्राम लेना सीखिए| आप जो कुछ भी कर रहे हैं उससे कम से कम १५ मिनट का विश्राम लीजिये| अकेले और किसी भी तरह के संचार साधन से दूर रहिये| यदि ऐसे समय में आपमें किसी भी प्रकार की नकारात्मकता भर जाए, तो उसे तुरन्त वहीँ पर बाहर निकाल दीजिये| इससे जब भी आप दुसरे व्यक्ति का सामना करोगे तब आपको उससे बिलकुल रुखाई से पेश नहीं आना पड़ेगा, और आपको थोडी मन की शान्ति भी मिलेगी|

जब आप थोड़े और शांत हो जाओ, तो सामने वाले व्यक्ति की ओर अपने वचन बध्दता के बारे में सोचो| यदि यह केवल व्यवसायिक है जहाँ आपको उस व्यक्ति का हर रोज़ सामना करना पड़ता है, तो सब कुछ बिगाड़ देने के बजाय बात को आत्मीयता से ख़तम करने में ही अधिक समझदारी है क्योंकि यह मुमकिन है कि कार्यस्थल के वातावरण को स्वस्थ रखने के लिए आपको उनके साथ कुछ संचार चालू रखना ही पड़ेगा|

यदि वचन बध्दता एकदम निजी हो – जैसे कोई परिवार का सदस्य या आपकी/का अर्धांगिनी/पति, तो यह सच है कि खुद को समझाना दस गुना अधिक मुश्किल हो जायेगा| हालाँकि, विश्राम काल व ठंडा हो जाने के बाद यदि आप खुद के साथ किसी समझौते पर नहीं आ पाते, तो कोई कठोर कदम उठाने से पहले किसी करीबी दोस्त से बात करके देखें| समस्या को बाँटने से उसका बोझ कम हो जाता है और सोचने के लिए आपको एक बेहतर दृष्टिकोण भी मिल सकता है|

उपरोक्त सभी कुछ करने के बाद – बड़ा चित्र देखने के बाद, विश्राम लेने के बाद, ठंडे हो जाने के बाद और खुद के साथ या किसी दोस्त के साथ विचार-विमर्श करने के बाद – जो बचता है वह है आखिरी सामना| यदि आपने शुरुआत के कदम मेहनत व सावधानी से उठाये हों तो भावुक और समझौतापरक होना आपके लिए आसान बात होनी चाहिए|

अपने शब्द होशियारी व समझदारी से चुनिए, खास करके तब जब आप किसी वरिष्ठ व्यक्ति के साथ कार्य करते हो| दु:खी होकर महत्वपूर्ण रिश्तों को नुकसान पहुँचाने से निश्चित होना बेहतर है| यह हमेशा कौन सही है और कौन गलत है इसके बारे में नहीं होता, यह सामने का व्यक्ति आप को, जो आप आज हैं, वह बनाने में कितना महत्वपूर्ण है उसके बारे में है! बेहतर अच्छाई के लिए माफ़ करना सीखो; क्षमा के दीर्घकालीन इनाम बहुत हैं! लोगों से वैसा ही व्यवहार करें जैसा आप चाहें की लोग आपके साथ करें और खुद को उनकी जगह पर रख कर देखें|

यदि आपको अपने रिश्तों में सबसे उत्कृष्ट स्तर के प्रेम, सुख, और सामंजस्य का अनुभव करना चाहते हैं तो मेरे ४-दिवसीय कैंप ‘अल्टीमेट लाइफ’ में जुड़ जाइये जहाँ मैं एक पूरा दिन अद्भुत रिश्ते बनाने में निकालता हूँ|

पश्च-लेख: उपरोक्त सब कुछ पढने के बाद यदि आपको लगे कि अपने अहंकार को पुष्टि देने के लिए जिद्दी होना और जीतना आपके लिए दूसरों की भावनाओं से अधिक महत्त्व का है तो याद रखिये कि हर रिश्ता एक दो-तरफ़ा रास्ता है| जो आप देते हैं वहीँ आपको वापस मिल सकता है और तब जब आप उसे बिलकुल नहीं चाहते, और ज्यादातर बार वह बहुत ज्यादा बदतर होता है|

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