SOLVING THE DILEMMA BETWEEN DHARMA & KARTAVYA IN DAY-TO-DAY LIFE

Written by Sneh Desai on October 6, 2017

DHARMA-AND-KARTAVYA




Understanding The Problem

Irrespective of whether one is religious/spiritual or not, inadvertently all of us are faced with the dilemma of doing what is right and doing what is asked of us, i.e., the dilemma between Dharma and Kartavya in our day-to-day lives. To solve this dilemma, it is important to first understand their true meanings and significance in our lives.
Simplistically put:-
Dharma – Doing what is right as per one’s set principles, morals or religious practices, keeping aside personal emotions and attachments.
Kartayva – Doing our duties to the best of our understanding and knowledge with respect to our work, family, friends etc.
After reading the aforesaid, a lot of questions arise – What exactly is the confusion? Is being rational adequate enough since this difference of probable philosophies only substantiates when our right or wrong is different from the ideal right or wrong? Most of the times we are stuck at the crossroads where our duties defy our principles and hence we’re lost. For example – is doing charity, earning money, raising a family etc our dharma or kartavya?

Finding A Solution

The only way to arriving at a possible solution is to think outside the box and to think differently from what we have always been thinking. What if Dharma and Kartavya are not two different things? View Dharma as the super-set and Kartavya as its sub-set; which means that Dharma cannot exist without Kartavya and vice-versa. In the larger spectrum of things, sometimes life puts us in a difficult spot and we are unable to see the light amidst the darkness – but what we forget is that doing our duty to the people or circumstances that are dependent upon us is nothing but the compliance of Dharma. For example, Karna in the Mahabharata was very well aware that he was fighting against his own blood and was on the wrong side on the battlefield, yet he completed his duties with utmost diligence without wavering his allegiance to the Kauravas. To understand some hidden meanings of such stories of Krishna or Mahabharata, join Sneh’s FREE 4-days Discourse ‘Krishna Katha’. Running away from your duties in the name of Dharma is not Dharma at all! Without trying to sound overtly averse to religious or spiritual practices – people who want genuine peace and prosperity in life do not necessarily find it in temples or through reciting shlokas etc. These could be means of finding temporary solace. Although what shall drive and power you through this journey called Life is being honest and earnest to what you have been given, so that you can pave a better path for the future. However, if the former is more your way of feeling collected and happy then it is more than fine, to each his own!

Compliance In Day-To-Day Life
Through persistence, it is not very difficult to comply with Kartavya Dharma in our daily lives, i.e., to be able to do your duty without a continuous sense of confusion and disruption:-

• Keep an open-mind to new opinions along with having certain principles to live by, pass them onto your family and ALWAYS be open to discussion and debates. This attitude makes sure that your family-life can be led without such dilemmas because eventually you and your family shall live by the same value-system.
• Never run-away from a challenge. Life is supposed to be difficult, running away from the challenges leads to more chaos. Overcoming them however, is blissful.
• Be approachable instead of being aloof from people you work with no matter what your position in your organisation.
• Establish well-to-do work ethics, always be open to new suggestions and be dynamic & flexible to the changing environment.
• DO NOT DISCRIMINATE on the basis of caste, colour, sex, age, race, financial background etc. No one likes to be compartmentalised and judged into a particular type. Hence, treat EVERYONE the way you yourself would like to be treated. This way you shall always be open to learning new things.
• Listen to your heart before you rationalise too much with your mind. Dharma is only complete with Love.
• Be helpful, hopeful, positive and ALWAYS HAVE A SMILE.
In addition to this, Sneh Desai talks about ‘The Law of Dharma’ in his FREE 4-days Spiritual Discourse ‘Dynamic Yoga’.

The New Definiton

Needless to say that dissecting something already overtly complicated in a country like ours is a task in itself; but instead of overthinking such things acting after giving due importance to logic, understanding, love and instinct is sufficient enough! Hence, we now have our new definition:-

Kartavya Dharma – Doing what is right in carrying out one’s duties, keeping in mind one’s set principles, morals or religious practices, to the best of one’s knowledge yet with utmost love and respect for all!

धर्म व कर्त्तव्य के बीच के असमंजस को हल करना

समस्या को समझना

व्यक्ति धार्मिक/आध्यात्मिक है या नहीं इसका विचार किये बिना ही, अनजाने में ही हम सब को सही करने और जो हमें कहा गया है वह करने के असमंजस का सामना करना पड़ता है; अर्थात हमारे रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में के धर्म और कर्तव्य के बीच का असमंजस| इस दुविधा को हल करने के लिए, इन दो शब्दों के सही माइने समझना जरूरी है| सरल शब्दों में कहा जाये तो:-
धर्म – व्यक्तिगत उसूलों, नैतिकता, या धार्मिक प्रवृत्तियों पर जो खरा उतरता है उसे, निजी भावनाओं तथा आसक्ति को दूर रखते हुए, करना|
कर्तव्य – अपने कार्य; अपने काम, परिवार, मित्रों, आदि के सन्दर्भ में, अपनी बेहतरीन समझ-बूझ व ज्ञान के साथ; ठीक ढंग से करना|
उपरोक्त बातें पढ़कर काफी सारे प्रश्न उभरकर आते हैं – वास्तव में यह उलझन क्या है? क्या अक्लमंद होना काफी है, क्योंकि इन संभावित फ़लसफ़ों की भिन्नता केवल इस बात की पुष्टि देती है, कि कब हमारे सही या गलत, आदर्श सही या गलत से अलग हैं? ज्यादातर बार तो हम इस दोराहे पर अटक जाते हैं जहाँ हमारे कर्तव्य हमारे उसूलों के खिलाफ जाते हैं और इसी कारण से हम हैरान हो जाते हैं| उदाहरणत: – क्या दान देना, पैसा कमाना, परिवार को पाल-पोसकर बड़ा करना, आदि हमारा धर्म है या हमारा कर्तव्य?

हल ढूंढना

किसी सही हल तक पहुँचने का एक ही मार्ग है, और वह है की आज तक जो हम सोचते आ रहे हैं उससे कुछ नया और अलग सोचना| यदि धर्म और कर्तव्य दो अलग बातें ना हो तो? धर्म को उच्च वर्ग और कर्तव्य को उपवर्ग की तरह देखिये; जिसका अर्थ यह है की धर्म का कर्तव्य के बिना और कर्तव्य का धर्म के बिना अस्तित्व ही नहीं है| अधिक विस्तृत पयमाने पर देखें तो, कभी-कभी ज़िंदगी हमें एक दूभर स्थान पर लाकर पटक देती है और इस घोर अन्धकार में हम रौशनी की हलकीसी एक भी किरण नहीं देख पाते – लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि हम पर जो निर्भर हैं उन लोगों या परिस्थियियों के लिए जो हमारा कर्तव्य है वही हमारे लिए धर्म की आज्ञापालन है, और कुछ नहीं| उदहारणतः – महाभारत में कर्ण को भलीभांति मालूम था कि वह अपने ही खून से युध्द कर रहा था और वह रणभूमि की अनुचित पक्ष में था, फिर भी उसने कौरवों के प्रति अपने कर्तव्य, पूरी निष्ठा से और एक बार भी विचलित ना होकर, निभाए| कृष्ण और महाभारत की ऐसी कथाओं का गूढ़ अर्थ समझने के लिए, डॉ. स्नेह देसाई के ४-दिवसीय नि:शुल्क प्रवचन ‘कृष्ण कथा’ में जुड़ जाओ| धर्म के नाम पर अपने कर्तव्यों से भाग खड़ा होना किसी भी तरह से धर्म नहीं है| खुल्लमखुल्ला धार्मिक या आध्यात्मिक प्रवृत्तियों के विरुध्द प्रतीत हुए बिना – जिन लोगों को असली शान्ति और समृध्दी की खोज होती है, ज़रूरी नहीं है कि वह उन्हें मंदिरों में या श्लोकोक्ति से मिले| यह अल्पकालिक आश्वासन पाने का तरीका हो सकता है| फिर भी आपको इस जीवनरुपी यात्रा में जो प्रेरित और सशक्त करेगा वह है, आपको जो मिला है उसके प्रति प्रमाणिक और उत्साही रहना, ताकि आप भविष्य के लिए एक बेहतर मार्ग बना सकें| लेकिन, यदि पहला तरीका आपको अधिक शांत और प्रसन्न महसूस कराता हो, तो बेहतर है, पसंद अपनी अपनी!

रोज़मर्रा के जीवन में आज्ञापालन
सतात्य की बदौलत, अपने प्रतिदिन के कर्तव्य धर्म का आज्ञापालन करना मुश्किल नहीं है, अर्थात, अपने कर्तव्य को लगातार के उलझन और विघ्न बिना निभा सकना:-
• नए अभिप्रायों के लिए मन खुला रखने के साथ-साथ जीवन नियत उसूलों के साथ जीओ, और उन्हें अपने परिवार में आगे बढाइये और हमेशा विचार-विमर्श तथा बहस के लिए तैयार रहिये| इस रवैये से यह निश्चित हो जायेगा की आपका परिवारिक जीवन इन दुविधाओं के बिना आगे बढेगा क्योंकि अंततः आप और आपका परिवार समान आदर्श-व्यवस्था के साथ जियेंगे|
• कभी भी चुनौती से मत भाग जाओ| जीवन कठिन ही है, चुनौतियों से भागने से उथल-पुथल और बढ़ जाएगी| लेकिन उन पर काबू पाना सुखद होता है|
• अपने संस्था में आपका जो भी दर्जा हो, जिनके साथ आप काम करते हो उन लोगों से दूर रहने के बजाय मिलनसार बनो|
• काम करने का खुशहाल नीतिशास्त्र कायम करो, नए सुझावों क लिए हमेशा तैयार रहो, और अपने बदलते वातावरण के साथ स्फूर्त व अनुनेय बनो|
• जाति, रंग, लिंग, उम्र, प्रजाति, आर्थिक पृष्ठभूमि, आदि के आधार पर भेदभाव कभी मत करो| किसी भी ढांचे में ढाला जाना और विशिष्ट प्रकार से अंकित होना किसी को भी अच्छा नहीं लगता| अतः सब से उसी तरह व्यवहार करो जैसा आप खुद के साथ चाहते हो| ऐसा करने से आप हमेशा नयी बातें सीखने के लिए तैयार होंगे|
• अपने दिमाग से अधिक तर्क-वितर्क करने से पहले अपने दिल की सुनो| धर्म प्यार से ही परिपूर्ण होता है|
• सहायक, आशावादी, हकारात्मक बनो और हमेशा मुस्कुराते रहो|

इसके अतिरिक्त, स्नेह देसाई ‘धर्म का कानून’ (द लॉ ऑफ़ धर्म) के बारे में अपने ४-दिवसीय नि:शुल्क आध्यात्मिक प्रवचन ‘डायनामिक योग’ में बात करते हैं|

नयी व्याख्या
कहने की ज़रुरत नहीं है कि पहले से ही खुल्लमखुल्ला पेचीदा चीज़ का पृथक्करण करना और वह भी अपने जैसे देश में अपने आप में ही एक बड़ा कठिन कार्य है; लेकिन इन बातों के बारे में अत्यधिक सोचने के बजाय, तर्क, समझ-बूझ, प्यार और सहजज्ञान को यथार्थ महत्त्व देकर कार्य करना काफी है! अतः अब हमारे पास हमारी नयी व्याख्या यह है:-
कर्तव्य धर्म – अपने नियत उसूलों, नैतिकताओं या धार्मिक प्रवृत्तियों को अपने ज्ञान के बेहतरीन जानकारी के साथ मन में रखते हुए और हर एक के लिए सर्वाधिक प्रेम व आदर भाव के साथ अपना कर्तव्य निभाने के लिए जो सही है वही करना!

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