Understanding The Problem

Irrespective of whether one is religious/spiritual or not, inadvertently all of us are faced with the dilemma of doing what is right and doing what is asked of us, i.e., the dilemma between Dharma and Kartavya in our day-to-day lives. To solve this dilemma, it is important to first understand their true meanings and significance in our lives.
Simplistically put:-
Dharma – Doing what is right as per one’s set principles, morals or religious practices, keeping aside personal emotions and attachments.
Kartayva – Doing our duties to the best of our understanding and knowledge with respect to our work, family, friends etc.
After reading the aforesaid, a lot of questions arise – What exactly is the confusion? Is being rational adequate enough since this difference of probable philosophies only substantiates when our right or wrong is different from the ideal right or wrong? Most of the times we are stuck at the crossroads where our duties defy our principles and hence we’re lost. For example – is doing charity, earning money, raising a family etc our dharma or kartavya?

Finding A Solution

The only way to arriving at a possible solution is to think outside the box and to think differently from what we have always been thinking. What if Dharma and Kartavya are not two different things? View Dharma as the super-set and Kartavya as its sub-set; which means that Dharma cannot exist without Kartavya and vice-versa. In the larger spectrum of things, sometimes life puts us in a difficult spot and we are unable to see the light amidst the darkness – but what we forget is that doing our duty to the people or circumstances that are dependent upon us is nothing but the compliance of Dharma. For example, Karna in the Mahabharata was very well aware that he was fighting against his own blood and was on the wrong side on the battlefield, yet he completed his duties with utmost diligence without wavering his allegiance to the Kauravas. To understand some hidden meanings of such stories of Krishna or Mahabharata, join Sneh’s FREE 4-days Discourse ‘Krishna Katha’. Running away from your duties in the name of Dharma is not Dharma at all! Without trying to sound overtly averse to religious or spiritual practices – people who want genuine peace and prosperity in life do not necessarily find it in temples or through reciting shlokas etc. These could be means of finding temporary solace. Although what shall drive and power you through this journey called Life is being honest and earnest to what you have been given, so that you can pave a better path for the future. However, if the former is more your way of feeling collected and happy then it is more than fine, to each his own!

Compliance In Day-To-Day Life
Through persistence, it is not very difficult to comply with Kartavya Dharma in our daily lives, i.e., to be able to do your duty without a continuous sense of confusion and disruption:-

• Keep an open-mind to new opinions along with having certain principles to live by, pass them onto your family and ALWAYS be open to discussion and debates. This attitude makes sure that your family-life can be led without such dilemmas because eventually you and your family shall live by the same value-system.
• Never run-away from a challenge. Life is supposed to be difficult, running away from the challenges leads to more chaos. Overcoming them however, is blissful.
• Be approachable instead of being aloof from people you work with no matter what your position in your organisation.
• Establish well-to-do work ethics, always be open to new suggestions and be dynamic & flexible to the changing environment.
• DO NOT DISCRIMINATE on the basis of caste, colour, sex, age, race, financial background etc. No one likes to be compartmentalised and judged into a particular type. Hence, treat EVERYONE the way you yourself would like to be treated. This way you shall always be open to learning new things.
• Listen to your heart before you rationalise too much with your mind. Dharma is only complete with Love.
• Be helpful, hopeful, positive and ALWAYS HAVE A SMILE.
In addition to this, Sneh Desai talks about ‘The Law of Dharma’ in his FREE 4-days Spiritual Discourse ‘Dynamic Yoga’.

The New Definiton

Needless to say that dissecting something already overtly complicated in a country like ours is a task in itself; but instead of overthinking such things acting after giving due importance to logic, understanding, love and instinct is sufficient enough! Hence, we now have our new definition:-

Kartavya Dharma – Doing what is right in carrying out one’s duties, keeping in mind one’s set principles, morals or religious practices, to the best of one’s knowledge yet with utmost love and respect for all!

धर्म व कर्त्तव्य के बीच के असमंजस को हल करना

समस्या को समझना

व्यक्ति धार्मिक/आध्यात्मिक है या नहीं इसका विचार किये बिना ही, अनजाने में ही हम सब को सही करने और जो हमें कहा गया है वह करने के असमंजस का सामना करना पड़ता है; अर्थात हमारे रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में के धर्म और कर्तव्य के बीच का असमंजस| इस दुविधा को हल करने के लिए, इन दो शब्दों के सही माइने समझना जरूरी है| सरल शब्दों में कहा जाये तो:-
धर्म – व्यक्तिगत उसूलों, नैतिकता, या धार्मिक प्रवृत्तियों पर जो खरा उतरता है उसे, निजी भावनाओं तथा आसक्ति को दूर रखते हुए, करना|
कर्तव्य – अपने कार्य; अपने काम, परिवार, मित्रों, आदि के सन्दर्भ में, अपनी बेहतरीन समझ-बूझ व ज्ञान के साथ; ठीक ढंग से करना|
उपरोक्त बातें पढ़कर काफी सारे प्रश्न उभरकर आते हैं – वास्तव में यह उलझन क्या है? क्या अक्लमंद होना काफी है, क्योंकि इन संभावित फ़लसफ़ों की भिन्नता केवल इस बात की पुष्टि देती है, कि कब हमारे सही या गलत, आदर्श सही या गलत से अलग हैं? ज्यादातर बार तो हम इस दोराहे पर अटक जाते हैं जहाँ हमारे कर्तव्य हमारे उसूलों के खिलाफ जाते हैं और इसी कारण से हम हैरान हो जाते हैं| उदाहरणत: – क्या दान देना, पैसा कमाना, परिवार को पाल-पोसकर बड़ा करना, आदि हमारा धर्म है या हमारा कर्तव्य?

हल ढूंढना

किसी सही हल तक पहुँचने का एक ही मार्ग है, और वह है की आज तक जो हम सोचते आ रहे हैं उससे कुछ नया और अलग सोचना| यदि धर्म और कर्तव्य दो अलग बातें ना हो तो? धर्म को उच्च वर्ग और कर्तव्य को उपवर्ग की तरह देखिये; जिसका अर्थ यह है की धर्म का कर्तव्य के बिना और कर्तव्य का धर्म के बिना अस्तित्व ही नहीं है| अधिक विस्तृत पयमाने पर देखें तो, कभी-कभी ज़िंदगी हमें एक दूभर स्थान पर लाकर पटक देती है और इस घोर अन्धकार में हम रौशनी की हलकीसी एक भी किरण नहीं देख पाते – लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि हम पर जो निर्भर हैं उन लोगों या परिस्थियियों के लिए जो हमारा कर्तव्य है वही हमारे लिए धर्म की आज्ञापालन है, और कुछ नहीं| उदहारणतः – महाभारत में कर्ण को भलीभांति मालूम था कि वह अपने ही खून से युध्द कर रहा था और वह रणभूमि की अनुचित पक्ष में था, फिर भी उसने कौरवों के प्रति अपने कर्तव्य, पूरी निष्ठा से और एक बार भी विचलित ना होकर, निभाए| कृष्ण और महाभारत की ऐसी कथाओं का गूढ़ अर्थ समझने के लिए, डॉ. स्नेह देसाई के ४-दिवसीय नि:शुल्क प्रवचन ‘कृष्ण कथा’ में जुड़ जाओ| धर्म के नाम पर अपने कर्तव्यों से भाग खड़ा होना किसी भी तरह से धर्म नहीं है| खुल्लमखुल्ला धार्मिक या आध्यात्मिक प्रवृत्तियों के विरुध्द प्रतीत हुए बिना – जिन लोगों को असली शान्ति और समृध्दी की खोज होती है, ज़रूरी नहीं है कि वह उन्हें मंदिरों में या श्लोकोक्ति से मिले| यह अल्पकालिक आश्वासन पाने का तरीका हो सकता है| फिर भी आपको इस जीवनरुपी यात्रा में जो प्रेरित और सशक्त करेगा वह है, आपको जो मिला है उसके प्रति प्रमाणिक और उत्साही रहना, ताकि आप भविष्य के लिए एक बेहतर मार्ग बना सकें| लेकिन, यदि पहला तरीका आपको अधिक शांत और प्रसन्न महसूस कराता हो, तो बेहतर है, पसंद अपनी अपनी!

रोज़मर्रा के जीवन में आज्ञापालन 
सतात्य की बदौलत, अपने प्रतिदिन के कर्तव्य धर्म का आज्ञापालन करना मुश्किल नहीं है, अर्थात, अपने कर्तव्य को लगातार के उलझन और विघ्न बिना निभा सकना:-
• नए अभिप्रायों के लिए मन खुला रखने के साथ-साथ जीवन नियत उसूलों के साथ जीओ, और उन्हें अपने परिवार में आगे बढाइये और हमेशा विचार-विमर्श तथा बहस के लिए तैयार रहिये| इस रवैये से यह निश्चित हो जायेगा की आपका परिवारिक जीवन इन दुविधाओं के बिना आगे बढेगा क्योंकि अंततः आप और आपका परिवार समान आदर्श-व्यवस्था के साथ जियेंगे|
• कभी भी चुनौती से मत भाग जाओ| जीवन कठिन ही है, चुनौतियों से भागने से उथल-पुथल और बढ़ जाएगी| लेकिन उन पर काबू पाना सुखद होता है|
• अपने संस्था में आपका जो भी दर्जा हो, जिनके साथ आप काम करते हो उन लोगों से दूर रहने के बजाय मिलनसार बनो|
• काम करने का खुशहाल नीतिशास्त्र कायम करो, नए सुझावों क लिए हमेशा तैयार रहो, और अपने बदलते वातावरण के साथ स्फूर्त व अनुनेय बनो|
• जाति, रंग, लिंग, उम्र, प्रजाति, आर्थिक पृष्ठभूमि, आदि के आधार पर भेदभाव कभी मत करो| किसी भी ढांचे में ढाला जाना और विशिष्ट प्रकार से अंकित होना किसी को भी अच्छा नहीं लगता| अतः सब से उसी तरह व्यवहार करो जैसा आप खुद के साथ चाहते हो| ऐसा करने से आप हमेशा नयी बातें सीखने के लिए तैयार होंगे|
• अपने दिमाग से अधिक तर्क-वितर्क करने से पहले अपने दिल की सुनो| धर्म प्यार से ही परिपूर्ण होता है|
• सहायक, आशावादी, हकारात्मक बनो और हमेशा मुस्कुराते रहो|

इसके अतिरिक्त, स्नेह देसाई ‘धर्म का कानून’ (द लॉ ऑफ़ धर्म) के बारे में अपने ४-दिवसीय नि:शुल्क आध्यात्मिक प्रवचन ‘डायनामिक योग’ में बात करते हैं|

नयी व्याख्या
कहने की ज़रुरत नहीं है कि पहले से ही खुल्लमखुल्ला पेचीदा चीज़ का पृथक्करण करना और वह भी अपने जैसे देश में अपने आप में ही एक बड़ा कठिन कार्य है; लेकिन इन बातों के बारे में अत्यधिक सोचने के बजाय, तर्क, समझ-बूझ, प्यार और सहजज्ञान को यथार्थ महत्त्व देकर कार्य करना काफी है! अतः अब हमारे पास हमारी नयी व्याख्या यह है:-
कर्तव्य धर्म – अपने नियत उसूलों, नैतिकताओं या धार्मिक प्रवृत्तियों को अपने ज्ञान के बेहतरीन जानकारी के साथ मन में रखते हुए और हर एक के लिए सर्वाधिक प्रेम व आदर भाव के साथ अपना कर्तव्य निभाने के लिए जो सही है वही करना!


Laziness leads to more laziness just as activity leads to more activity. There is no need to point out how harmful it is because the focus should be on overcoming it. For people who are prone to lying lazy, it is a big change and needs patience and motivation. Therefore, since laziness is sometimes the only thing that stands between you and your dreams, here are a few steps to overcome it:-

Step I: REALIZATION – Acknowledging the cause
Stop living in denial. People who are perpetually lazy generally live in denial of it. Hence, the first step to improving any of your vices is to own them. Accept that you have been lazy, because if you don’t then how will you overcome it? Most often than not laziness stems from a negative place like fear, depression, constant fatigue, lack of motivation etc. Whatever it is that is holding you back, accept it since it is the only way you can address the issue. However, more importantly accept your problem without despair. No problem is too big to solve. If you get tired too easily, practice relaxation exercises. If you fear too much, answer difficult questions and rationalize. If you’re depressed, seek help and talk to people you can rely upon. If you’re hurt, give yourself time. If you’re unhappy with your physical self, start practicing Yoga or any other form of exercise. If you’re uninspired, revamp your normal routine. ACKNOWLEDGE!

Step II: SLOW AND STEADY – Small mitigating steps
Taking one big step towards mitigation often falters. Small steps add on to the big picture, ALWAYS! Hence, if laziness is a problem that you’re facing since a long time, go slow but steady. Some of them are as follows:-

a. Get Organized: Organization helps in overcoming the clutter both internally and externally. Keep your surroundings in the best of order and clarity of thought will be easier to obtain.
b. Tackle Smaller Tasks: For those who are overwhelmed easily by responsibility should break down big tasks into smaller tasks and goals and take one task at a time – bit by bit. This helps in keeping you focused without making you feel too pressured.
c. One Thing At One Time: Don’t take on a lot more than you can handle. Doing one thing at a time with utmost concentration helps doing just that with a lot of efficiency and effectiveness.
d. Exercise: Exercising releases endorphin, which helps in overcoming depression and constant fatigue. It also helps in boosting your energy levels and making you more active than usual.
e. Also, Rest and Sleep: Yes, laziness is a bit dragging but that does not mean you will suddenly become really hard on yourself. Don’t get too serious and get some rest. Ensure you get adequate sleep of up to 8 hours (approximately) every night.

Step III: KEEP A VISION BOARD – Avoid procrastination
The most important and significant reason/cause behind laziness is procrastination. Procrastination means an act of constantly putting off a task or delaying an important work till the last minute. This generally happens when people work at something that they do not love or are not very passionate about. Hence, keep a vision board to keep a check on your long term objectives – Something that reminds you of where you would want to be in the next five or ten years in your life. Accumulate all of those things and make a creative vision board without questioning your current circumstances and place that vision board somewhere you can see every day. This vision board will make sure you stop being lazy and work harder to get what you want! Lakhs of people have learnt how to make a result- generating vision board in Sneh Desai’s signature event ‘Change Your Life’ and have got breakthrough outcomes.

Step IV: CONSTANT WORK – Habituate yourself
To stop being lazy is something that needs to be inculcated constantly in your daily life for you to habituate yourself. Such constant work can only come from constant motivation. Continuously focus on the benefits that you will be able to reap if you overcome your laziness and start taking action. Constantly think about the consequences you will have to face in the long-run if you run away from your tasks today. DO all of this without giving in to the difficulties of everyday life – repeat affirmations and positive quotes that may help you keep on track. Also, when despair hits, learn from people who are successful. Always keeping a tab on people who have overcome a great deal to reach a luxurious life today, helps you regaining momentum and inspiration.

TAKEAWAY: Work really really really hard today to enjoy laziness at the right time – and not the other way around!

आलस को कैसे हराएँ

जिस तरह कार्यरत होना अधिक कार्य की ओर ले जाता है, ठीक उसी तरह आलस ही अधिक आलस की ओर ले जाता है| यह कितना नुकसानदेय है उस तरफ निर्देश करना जरुरी नहीं है, क्योंकि हमारा ध्यान उसे पराजित करने पर होना चाहिए | ऐसे लोग जिन्हें आलसी होकर पड़े रहने की आदत है, उन में इस बड़े बदलाव को लाने के लिए धीरज और उत्तेजना चाहिए | अतः, चूँकि कई बार यह आलस ही आपके और आपके सपनों के बीच आता है, इसे परास्त करनेके कुछ सरल रास्ते यहाँ बताये गए हैं:

पहला चरण : अनुभूति – कारण को स्वीकारना
नकार में जीना बंद करो! जो लोग निरंतर आलसी हैं वे ज्यादातर उसके नकार में जीते हैं | आपको अपनी किसी भी बुराई को सुधारना हो तो पहले उसका स्वीकार करो | आप आलसी हो इस बात को स्वीकार लो, क्योंकि आप अगर ऐसा नहीं करते तो आप इसे परास्त कैसे कर पाओगे?

जो भी बात आपको पीछे खींच रही है, उसका स्वीकार करो, क्योंकि यह एक ही रास्ता है जिससे आप प्रश्न का हल पा सकते हो | अपनी समस्या से निराश हुए बिना उसका स्वीकार करें | कोई समस्या इतनी बड़ी नहीं होती की जिसका कोई हल न हो | यदि आप बहुत जल्दी थक जाते हो, तो आप तनाव मुक्ति के लिए कोई कसरत करें| अगर आपको डर लगता है तो मुश्किल सवालों के जवाब दीजिए और अगर आप निराश हो गए हैं तो जिनपर आप भरोसा करते हैं उनसे बात कीजिए, उनकी मदद लीजिए | अगर आप को कष्ट पहुंचा है अपने आप को वक्त दीजिए | अगर आप शारीरिक रूप से नाखुश हैं तो आप योग कीजिए या किसी भी तरह का व्यायाम कीजिए | फिर भी आप उत्साहित नहीं होते हो तो आपके रोज के काम करनेके तरीके को दुरस्त कीजिए | अतः, स्वीकारो|

दूसरा चरण : धीरे से और स्थिरता के साथ – छोटे आसान से कदम
काम आसान करने के लिए एक बड़ी छलांग ज्यादातर बार असफल साबित होती है| छोटे कदम जोड़ते जाओगे तो बड़ा द्रश्य बनेगा, हमेशा! लिहाजा, अगर आलस लम्बे समय से आपकी समस्या है तो, धीरेसे और दृढ़ता से आगे बढिए| कुछ सरल व छोटे कदम नीचे बताये गए हैं:-

अ. व्यवस्थित बनो : व्यवस्थापन जीतने में मदद करता है और भीतर तथा बाहर की अव्यवस्था को दूर करने मे मदद करता है |आपके आसपास के वातावरण को उत्तम हालत में रखो जिससे आपको विचारों की शुध्दता पाने में सरलता रहेगी |
ब. छोटे कार्यों पर काबू पाइए : जो सरलतासे जवाबदारियों से पुर्णतः हार गए हों उन्हें बड़े कार्यों को छोटे कार्यों में और बड़े ध्येयों को छोटे ध्येयों में विभाजित करना चाहिए और एक वक्त में एक ही कार्य हाथ धरना चाहिए – धीरे-धीरे, थोड़ा-थोड़ा| ऐसा करने से आप निश्चित ही ध्येय की ओर जा सकते हैं और आप पर कोई दबाव भी नहीं पड़ता |
क. एक वक्त में एक काम : आप कर सकें उससे ज्यादा कम हाथ में ना लें| एक वक्त में एक ही काम पूरा ध्यान लगाकर करने से कार्यक्षमता और प्रभावकारिता / कार्यसाधकता बढती है |
ड. व्यायाम : व्यायाम करने से एंडोर्फिन स्त्रावित होता है, जो हताशा और थकान पर विजय पाने में मदद करता है | इस से आपकी उर्जा का स्तर बढ़ने में मदद मिलती है और आप हमेश से ज्यादा कार्यशील हो सकते हो|
च. साथ-साथ विश्राम और नींद : हाँ आलस पीछे खींचता है पर इसका यह मतलब नहीं की आप अपने आप पर कुछ ज्यादा ही सख्त हो जायेंगे | बहुत ज्यादा गंभीर ना बनें और थोडा आराम कीजिए | ध्यान रहे की आपको ८ घंटे की नींद (लगभग) हर रात मिलना अत्यंत जरुरी है|

तीसरा चरण: एक अवलोकन फलक रखें – टालमटोल को टालें टालते रहेना
आलस के पीछे का सबसे महत्वपूर्ण और सूचक कारण है टालमटोल करना | टालमटोल का मतलब है की किसी महत्वपूर्ण काम को अंतिम क्षण तक नहीं करना या टालते रहेना| ज्यादातर यह तब होता है जब काम करने वालों का काम में दिल नहीं होता या उसके लिए उनमें जोश नहीं होता | अतः एक अवलोकन फलक रखें जो आपके दीर्घकालीन उद्देश्यों को ध्यान में रखेगा – आपको याद दिलाते रहेगा की आप अपनी ज़िन्दगी के आनेवाले ५ या १० सालों में कहाँ पहुँचना है |
अपने वर्त्तमान हालात को ध्यान में न लेते हुए उन सभी चीजों को इकठ्ठा करें और एक अवलोकन फलक तैयार करें और उसे ऐसी जगह पर रखें जहाँ आप रोज देख सकें| यह अवलोकन फलक आपको आलसी नहीं होने देगा और ज्यादा मेहनत से काम करके आपको जो पाना है उस की ओर ले जायेगा! लाखों लोगों ने परिणामलक्षी अवलोकन फलक कैसे बनाया जाता है, वह डॉ. स्नेह देसाई के सिग्नेचर इवेंट “Change Your Life” में सिखा है और चमत्कारिक परिणाम पाए हैं|

चौथा चरण: सतत काम – खुद को अभ्यस्त कर लो
आलस करना बंद करना एक ऐसी बात है जिसे आपको रोज की ज़िन्दगी में संजोना पड़ेगा तभी आप इससे अभ्यस्त हो सकेंगे | यह सतत कार्य सिर्फ सतत प्रेरणा से होता है| आलास छोड़ने से मिलने वाले फायदों की ओर हमेशा ध्यान केन्द्रित करने से आप आलास को पराजित कर सकते हैं और कार्यान्वित हो सकते हैं | अगर आप आज अपने कार्यों से भागते रहोगे तो आगे जाकर आपको इसके कौनसे दुष्परिणाम भुगतने पड़ेंगे इसका हर वक्त विचार कीजिए |
रोज की जिन्दगी की तकलीफों को बीच में लाये बिना यह सब कुछ करो – बार बार दृढ निश्चय करो और हकारात्मक वाक्यों का प्रयोग करो जो आपको सही राह पर रखेंगे | जब निराशा महसूस होने लगे तब सफल व्यक्तियों से सीखें| उन व्यक्तियों की क्रियाओं को ध्यान में रखो जिन्होंने बहुत सारी मुसीबतों का सामना किया हो और आज सफल नज़र आते हों, और शानदार आनंदपूर्ण जिन्दगी जी रहे हैं, जिससे आपको फिरसे उत्तेजना प्राप्त होगी और प्रेरणा भी मिलेगी |

इतना ले जाओ : आज बहुत, बहुत, बहुत ज्यादा काम कर लें ताकि सही समय पर आलस का आनंद उठा सकें – और इसके विपरीत नहीं!


Habits are the small decisions you make and actions you perform every day. Your life today is essentially the sum of your habits. How in shape or out of shape you are? How happy or unhappy you are? How successful or unsuccessful you are? Everything is as a result of your habits. What you do, day-in-day-out, makes you the person you are today, your belief system and your personality.
In the light of the above, to build good habits is a behavioral change which requires a fresh start, patience and perseverance keeping in mind how significant the change could be to you and the people around you.

1. Start small, silly! Change of habits is a struggle which needs constant upkeep and motivation. But this journey needs to start with something small which should not be something entirely insignificant. Our willpower declines as and when our day progresses and subsequently our motivation does too. Hence, picking a habit that is too easy but not unimportant can help you inculcate it without the need of either much motivation or a lot of stress. For example, instead of directly exercising early in the morning for an hour, start with just waking up early first! And then gradually start exercising for a few minutes till you know you can do it for an hour; and so on and so forth.

2. Simple disciplines every day! Be constant. Instead of taking on something too big every now and then, just do small good things every day. Every tiny grain of effort towards doing something good on a continual basis is better than making errors of judgment about taking up something incredibly huge right at the beginning. Along the way, your willpower and motivation will increase, which will make it easier to stick to your habit. Discipline is key – just simple ones! To help you remain on track or disciplined, Sneh Desai has designed a powerful product ‘The Last Lap’ which will ensure your everyday action in order to achieve any results you want. You cannot NOT achieve your goals with this product.

3. Be reasonable! Let momentary motivation not go to your head so much that you lose vision and become preposterous. Be practical with yourself. Break the habit you want to pursue into smaller parts; this way you will gain a steady momentum and the habit will become easier to accomplish. For example – if you want to build up to 20 minutes of meditation every day,split it into two segments of 10 minutes at first.

4. Quickly get back on track! In case while building a habit, you fail – there should be a quick mechanism for rehabilitation so that you get back on track. You shouldn’t expect to fail, but you should plan for failure. So quit being a perfectionist; it is not an extremist situation! Everybody fails, but only those who get back on track quickly succeed!

5. Patience for sustenance! New habits should feel easy, especially in the beginning. If you stay consistent and continue increasing your habit it will get hard enough, fast enough. Learning to be patient is perhaps the most critical skill of all. You can make incredible progress if you are consistent and patient. Patience is everything. Do things at a pace which you can sustain.

6. Set a reminder! If you’re a human, then your memory will fail you (most of the times!). This is why a reminder is such a critical part of forming new habits. Reminder does not depend on motivation; it depends on strategically managing your new behavior with your old one. Since all of us are visual beings, setting up a visual reminder is more effective. For example, you want to become more grateful then remind yourself that before taking your meals, you will focus on one thing that you’re grateful for. This way every time you sit for breakfast, lunch or dinner you shall remember to say thanks!

7. Reward yourself! It’s important to celebrate. We want to continue doing things that make us feel good. And because an action needs to be repeated for it to become a habit, it’s especially important that you reward yourself each time you practice your new habit. Give yourself some credit and enjoy each success. Sneh Desai shares some secret habits in detail that all the successful people follow (but people don’t know) in his ‘Winning Habits’ Seminar.

TAKEAWAY: Decide on which habits are important to you; the ones you want to relentlessly pursue instead of listening to others and follow their footsteps. Just be patient and consistent.

अच्छी आदतें कैसे बनती हैं?

आदत क्या हैं? रोज किये हुए छोटे निर्णय जिनका आप अमल करते हो वही आदत है| आपकी आजकी जिन्दगी आपकी आदतों का ही सारांश है| आप कितने स्वस्थ हैं या नहीं हैं? आप खुश या नाखुश हैं? आप कितने सफल या असफल हैं? यह सारी बातें आदतों का ही परिणाम है| दिन भर में आप जो करते हैं, उसी के कारण आज आप जो हैं वह बने हो, यही आपकी सही मान्यता और व्यक्तित्व है|
उपर जो कहा है उसके प्रकाश में, अच्छी आदतें अपनाना एक स्वभावजन्य बदलाव है जिसके लिए यह ध्यान में रखना होगा की यह बदलाव आपके लिए तथा आपके आसपास के लोगों के लिए कितना आवश्यक है; और फिर इसके लिए नए सिरे से शुरुआत करने की, धीरज की और दृढ़ता की जरूरत होगी|

१. छोटे से शुरू करें, मूर्ख! आदतों को बदलना संघर्ष हैं जो की सतत पुष्टि व उत्तेजना मांगता है| पर यह सफ़र किसी छोटी बात से, जो बिलकुल निरर्थक न हो, शुरू करना चाहिए| हमारा आत्मसंयम दिन बढ़ने के साथ कम होता जाता हैं और साथ ही हमारी उत्तेजना भी कम होती है| अतः एक आसान सी और थोड़ी उपयोगी भी हो ऐसी आदत डालने में काफी सरल होता है और इसके लिए आपको अधिक तनाव या प्रेरणा की आवश्यकता भी नहीं होगी| उदहारणतः; रोज सुबह सीधे १ घंटा व्यायाम शुरू करने के बदले पहेले सुबह जल्दी उठने की आदत बनायें| फिर बाद में, धीरे धीरे कुछ क्षणों के लिए व्यायाम शुरू करना चाहिए और जब आपको लगे की आप १ घंटा कर सकते हो तब बढ़ाना चाहिए; जिसे फिर आगे बढ़ाते हुए कायम करना चाहिए|

२. हर रोज़ सरल अनुशासन! अटल बनो| हमेशा कुछ बहुत बड़ा ठान लेने के बजाय, छोटी छोटी अच्छी चीजे रोज करनी चाहिए| शुरुआत में ही कुछ आश्चर्यजनक रूप से बड़ा करके गलतियाँ करने के बदले कुछ छोटा, मगर अच्छा करते रहने का हर एक अविरत प्रयास अधिक बेहतर है| साथ साथ आपकी संकल्प शक्ति और उत्तेजना भी बढ़ेगी, जिससे आपको आदत से चिपके रहने में मदद मिलेगी| इसकी एक ही गुरुचाबी हैं – अनुशासन| बहुत सरल है| अपने मार्ग पर डटे रहने के लिए या अनुशासन में रहने के लिए डॉ.स्नेह देसाई ने एक बहुत ही कार्यक्षम प्रस्तावना बनाई हैं “ध लास्ट लैप” जो आप के रोज के प्रयास और जो परिणाम आपको पाने हो उसमे मदद करेगी| इस की मदद से आप जो लक्ष्य पाना चाहते हो वह नहीं पाओगे ऐसा हो ही नहीं सकता|

३. तर्कसंगत बनें! क्षणिक उत्तेजना से आपका दिमाग भ्रमित हो जाएँ और अपना लक्ष्य खो दें और हास्यास्पद बन जाएँ यह भी ठीक नहीं होगा| अपने आप के साथ वास्तविक बने | आप जो भी आदत अपनाना चाहते हो उसे छोटे हिस्सों में बांट दो; इस तरह से आपको स्थायी आवेग मिलेगा और आदत डाल लेने में सरलता होगी| उदाहरणतः – आपको २० मिनिट ध्यान की आदत डालनी है, तो आप उसको १०-१० मिनिट के दो हिस्सों में विभाजित कीजिए|

४. जल्द ही सही मार्ग पर लौट आएँ! नई आदत आत्मसात करने की प्रक्रिया में आप नाकाम हो सकते हो – पुनरुध्धार की प्रक्रिया होनी चाहिए ताकि आप वापस पटरी पर आ सकें| आपको असफलता की अपेक्षा नहीं होनी चाहिए, परन्तु निष्फलता के लिए तैयार जरूर होना चाहिए| अतः आदर्शवादी बनना छोड़ दो; यह दुनिया का अंत नहीं है! हर कोई निष्फल हो सकता है, पर वही लोग सफल होते हैं जो जल्दी से सही मार्ग पर लौट आते हैं !

५. बने रहने के लिए धीरज! नई आदतें सरल लगनी चाहिए, खासकरके शुरुआत में| अगर आप आदत के प्रति दृढ रहें और उसे बढ़ाते ही रहें तो वह शीघ्र ही बहुत कष्टदेय बन जाएगी| शांत और संयमी रहना शायद सबसे महत्वपूर्ण कुशलता है| अगर आप धीरजवान और सातत्यपूर्ण हो तो आप अविश्वसनीय प्रगति कर सकते हो; सब्र ही सब कुछ है| आप इतनी ही गति से क्रियाएँ कीजिए जितनी आप बनाए रख सकें|

६. स्मरणपत्र को नियत करें! अगर आप इन्सान हैं तो आपकी याददाश्त आपको असफल बना सकती हैं [अधिकतर बार]! इसीलिए नई आदत डालने का नाजुक और जरुरी भाग एक स्मरण पत्र है| स्मरणपत्र प्रेरणा पर आधारित नहीं होता; वह आपकी नई आदत को युक्ति पूर्वक पुरानी आदत से बदलता है| जो दिखता हैं उसे ही हम सब ज्यादा याद रखते हैं; अतः सामने दिखाई दिखने वाला स्मरण पत्र ज्यादा असरकारक होता है| उदहारणतः – अगर आपको ज्यादा आभारी होना हैं ‘तो खाना खाने से पहेले अपने आपको आभार मानने के लिए याद कराओ ताकि आप उस चीज पर ध्यान केन्द्रित कर सकोगे जिसके लिए आप आभारी [कृतार्थ] हो| इस तरह जब भी आप नाश्ता करने या खाना खाने बैठोगे तब आप आभार व्यक्त करना नहीं भूलोगे!

७. खुद को ईनाम दें! प्रशंसा करना जरुरी है| हमें वही चीजें करते रहनी चाहिए जो हमें ख़ुशी दें| चूंकि एक कार्य बार बार करते रहने पर ही वह आदत बनता है, तो यह जरुरी हैं की जितनी बार आप अपनी नयी आदत का प्रयोग करें आप अपने आप को हर बार पुरस्कृत करें| अपने आप को थोडा यश दें और हर सफलता का आनंद लें| डॉ.स्नेह देसाई अपने “विनिंग हैबिट्स” सेमिनार में सफल व्यक्तियों की गुप्त आदतों के बारे में [जो लोगों को पता नहीं होती] विस्तार से बताते हैं |

इतना ले जाओ: कौन सी आदतें आपके लिए जरुरी हैं यह निश्चित करो: जो आपके लिए जरुरी हैं उसका निरंतर अनुसरण करो, दूसरों की और ध्यान न देकर उनके कदम पर चलने के बजाय| धीरज से काम लें और सुसंगत तथा दृढ़ रहें|


“A reader lives a thousand lives before he dies, said Jojen. The man who never reads lives only one.”
― George R.R. Martin, A Dance with Dragons

Perception of the world we live in can be grappled by two methods – experience and books. Experience is a more hands-on approach to leading life but is somehow limited. Books, on the other hand, are treasure chests filled with imagination and truth alike; posing no boundaries or limitations to your adventures. However, reading is a habit not everyone is well acquainted with. Hence, let’s enumerate reasons as to how reading impacts us and why we should read more.

1.It helps improve your mind: There are numerous stories that one can read both fiction and non-fiction. It is found that those who read have a more attuned brain than those who indulge in other passive hobbies and activities. It improves your brain both psychologically and cognitively; thereby helping you in acquiring and processing information more efficiently.

2.Better focus and concentration: Reading a book is nothing like reading a newspaper or a magazine or even a blog. It takes concentrated effort to sit down with a book and try to decipher the information it provides. It sounds difficult, but the more you do it the easier it gets for you to block the outside world and immerse yourself into a completely new one.

3.It is informative: Unlike newspapers, who report mostly current affairs, reading books can provide you with detailed information on so many different cultures, religions, caste, creed and sects. Magazines and newspapers can only give you a gist of everything happening around the world; but books take that a step ahead. Furthermore, it innately immerses you in the physical world of where the story takes place making you want to explore and learn more.

4.Helps build your vocabulary: How many times have we tried and failed in trying to learn new words and wanting to use them differently every now and then to improve our confidence? How many online courses have failed to help us accomplish a better vocabulary? Reading makes it utmost fun. And it does not even require an extra effort! Once you start enjoying the process of reading, your vocabulary enhances itself. Especially with the advent of Kindle readers and the likes, there is an offline Oxford dictionary available at your fingertips. From looking up words, to knowing how to pronounce it, to the complete etymology of a given word – everything is as easy as pie!

5.It improves your verbal skills: When you know more, it is easier for you to communicate with utmost precision- meaning you are able to describe how you feel a lot better. Not only is it beneficial in day-to-day casual conversations but also helps in making an impression at work meeting etc.

6.It improves your writing skills: The one golden rule for writers everywhere is to read more and more and more! The more you read, the better you write. Reading helps you understand the mind and the authorial voice of the writer – which in turn makes an impression on your mind and how you would write and perceive the society you live in.

7.It improves your imagination: Unlike play writing or script writing, books are descriptive in nature. They don’t merely provide basic information of plot but also enhance it by delving deep into the minds of the characters and the world they live in. Hence, by default it helps you to improve your imagination. You find yourself in the world that the book creates and you start picturing it. Once you start reading, your mind becomes more pictorial and hence improves your imaginative and creative skills and your memory.

8.It makes you smarter and interesting: As stated earlier, books are informative. The more you consume the more knowledge you derive. It is basically research in a relatively short amount of time. Avid readers tend to display a better understanding of how things work and in general about people. In a competitive world as ours, being book-smart is essential- especially for children in their academics. It makes you interesting as well without being too forthcoming!

9.It reduces stress: Reading silently by yourself for sixty minutes a day can help slow-down your heart rate and ease tension in muscles. It relaxes you and thus reduces stress. According to a research, it works better than other methods of reducing stress like listening to music, going for a walk or having a cup of tea. This is because reading forces you to concentrate and to mentally get out of your current whereabouts and situations and transports your mind elsewhere completely.

10.It has entertainment value: Reading is not a chore. We read profusely because it has entertainment value – Something out of the box and beyond normal. It is a lot, lot better than sitting in front of the T.V.! Reading amuses us while improving our life skills – and there is no better deal!

TAKEAWAY – Instead of another paragraph of conclusion let’s end this how we started it – with a quote.

“I find television very educating. Every time somebody turns on the set, I go into the other room and read a book.”

– Groucho Marx

हमें अधिक क्यों पढ़ना चाहिए?

जोजें ने कहा “एक पाठक मरने से पहले हज़ार जिन्दगियां जीता है| जो मनुष्य पढता नहीं वह एक ही ज़िन्दगी जीता है |” 

– जॉर्ज आर. आर. मार्टिन, ‘अ डांस विथ ड्रैगन्स’

ये दुनिया की जिसमें हम रहेते हैं, उसका प्रत्यक्ष ज्ञान दो तरह से हमारी पकड़ में आ सकता है – अनुभव और किताबें| जिन्दगी जीने की पध्दती का मार्गदर्शन अनुभव से हो सकता है पर यह सिमित है| दूसरी ओर किताबें, खजाने कि संदुक की तरह कल्पना और सत्य से भरी हैं; जो हमारे साहस पर कोई सीमा या प्रतिबंद नहीं लगाते हैं| फिर भी, पढ़ना एक ऐसी आदत है, जीससे हर कोई अभ्यस्त नहीं होता| अतः एक एक करके कारण देने होंगे की पढने से हमारी जिन्दगी पर क्या प्रभाव पड़ता है और हमने क्यों ज्यादा पढना चाहिए|

१. मन को सुधारने में मदद करता है: काल्पनिक और वास्तविक दोनों ही तरह की अनगिनत कहानियाँ हैं जो हर कोइ पढ़ सकता है| यह देखा गया है की जो लोग निष्क्रिय शौक रखते हैं, उनकी तुलना में पढने वालों का दिमाग ज्यादा लय में होता है| यह आपके दिमाग को मनोवैज्ञानिक और ज्ञानात्मक दोनों ही तरीके से सुधरता है: जिससे ज्ञान को पाने में और उस पर प्रक्रिया करने में ज्यादा कार्यक्षमता रहेती है|

२. बेहतर ध्यान और एकाग्रता: पुस्तक पढना मतलब समाचार पत्र, पत्रिका या ब्लॉग पढ़ने जैसा बिलकुल नहीं है| कोई पुस्तक लेके बेठना और ध्यानपूर्वक प्रयत्न करके जो गूढार्थ दिया गया है उसे समझने में वक्त लगता है| सुनने में यह मुश्किल जरूर लगता है, पर जितना ज्यादा आप पढ़ोगे उतना ही, बाहरी दुनिया से विमुख होना, और खुद एक नई ही दुनिया में डूबा देना, सरल होता जायेगा|

३. यह शिक्षाप्रद है: समाचार पत्रों की तरह मात्र चालू घटना क्रमों के बारे में ही नहीं, बल्कि किताबें पढने से हमें अलग अलग संस्कृतियों, भाषाओं, जातियों, व संप्रदायों के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है| समाचारपत्र या पत्रिकाएँ आपको सिर्फ आपके आसपास की दुनिया में क्या हो रहा है उसकी विस्तृत जानकारी देते हैं; जबकि किताबें इससे एक कदम आगे ले जाती है| और ज्यादा कहूँ तो वे [किताबें] आपको शारीरिक रूप से घटनास्थल पर सहजता से पहुंचाकर तल्लीन कर देती है जिसके फलःस्वरूप आप को अधिक जानकारी प्राप्त करने में तथा अधिक सिखने में मदद होती है|

४. आपका शब्द भंडार बढ़ाने में सहायक: अपना आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए हमने कितनी बार नए शब्द सीखना और उनका अलग अलग तरह से प्रयोग करने की कोशिश की है और नाकाम हुए? कितने ऑनलाइन कोर्स हमारे शब्द भंडार को बढ़ाने में निष्फल साबित हुए हैं? पढना इसे अत्यधिक मज़ेदार बना देता है| और उसके लिए ज्यादा प्रयत्न भी नहीं करना पड़ता! एक बार आप पढने की प्रक्रिया का आनंद लेने लगते हो, तो आपका शब्द भंडार अपने आप ही बढ़ता जाता है| खास करके ‘किंडल’ जैसे पाठकों के  आगमन के कारण ‘ऑक्सफ़ोर्ड’ जैसा शब्दकोष आपके अंगुलाग्रों पर उपलब्ध है| उस में शब्द को ढूँढने से, व उसके उच्चारण से ले कर शब्द की सम्पूर्ण व्युत्पत्ति तक – सब कुछ एकदम आसान हो जाता है|

५. आपकी शाब्दिक निपुणता सुधर जाती है: जब आप ज्यादा जानते हो, तो आपको अपनी बात एकदम सटीक तरीके से करने में आशिक आसानी होती है – अर्थात आप जो भी महसूस करते हो उसे आप बेहतर शब्दों से बयां कर सकते हो| रोज बरोज के सामान्य वार्तालापों में ही नहीं परन्तु कार्यस्थल के अधिवेशन आदि में भी आप प्रभावशाली साबित होते हैं|

६. आपकी लेखन शैली सुधर जाती है: हर जगह लेखकों के लिए सुवर्ण अक्षरों में लिखा हुआ एक ही नियम है – पढो, ज्यादासे ज्यादा पढो! जितना ज्यादा आप पढोगे उतना अच्छा आप लिखोगे| पढ़ ने से आपको लेखकीय दिमाग तथा वाणी को समझने में मदद मिलेगी – जिसे के चलते आपके दिलोदिमाग व लेखन शैली पर, तथा आप जिस समाज में रहते हो और उसको आप कैसे देखते-समझते हो – इन सब पर एक प्रभाव पड़ता है|

७. आपकी कल्पना शक्ति को उत्कृष्ठ बनाता है: नाट्यलेखन व कथानक लेखन से काफी भिन्न, किताबें वर्णनात्मक होती हैं| वे न केवल कथावस्तु की बुनियादी जानकारी देती हैं पर खूब छानबीन करके, पत्रों के दिमाग में घुसकर वे जहाँ व जिस दुनिया में रहते है वहीँ हमें ले जाती है| इस वजह से वे बकाया आपकी कल्पना शक्ति बेहतर बनाने में मदद करती है| आप अपने आप को किताब की दुनिया में पाते हो और आप उसका दृश्य बनाने लगते हो| एक बार आप किताब पढना शुरू कर देते हो तो आपका दिमाग चित्रात्मक हो जाता है, अतः आपकी कल्प्नात्मक और सर्जनात्मक शक्तियाँ तथा स्मरणशक्ति बेहतर हो जाती है|

८. यह आपको तेज़-तर्रार और रोचक बनाता है: आगे कहा वैसे, किताबें शिक्षाप्रद होती हैं| आप जितनी ज्यादा पढ़ते हो उतना ज्यादा ज्ञान आप पाते हो| यह मूलतः कम समय में किया गया संशोधन है| उत्साही वाचक चीजें कैसे काम करती है तथा सामान्यतः लोगों के बारे में अधिक समझ-बूझ दर्शाते हैं| हमारे स्पर्धात्मक जगत में “पुस्तक ज्ञानी” होना अति जरुरी है – खास करके बच्चों को उनकी बेहतर शिक्षा के लिए| यह आपको स्पष्टवादी ना बनाते हुए भी रोचक बनाता है|

९. यह तनाव कम करता है: दिन में ६० मिनिट शांतिसे मन में पढने से ह्रदय की गति को कम करने में मदद मिलती है, और माँसपेशियों में तनाव कम होता है| यह आपको विश्रांति देता है जिससे आपका तनाव कम हो जाता है| एक अन्वेषण के अनुसार, यह तनाव कम करने के अन्य तरीके जैसे संगीत सुनना, चलने जाना, या चाय पीना, से अधिक बेहतर साबित हुआ है| ऐसा इस लिए होता है क्योंकि पढना जबदस्ती से आपका ध्यान अपने हालातों व ठौर-ठिकानों से हटाके पूर्ण तरह से दूसरी जगह पर केन्द्रित करने व वहीँ पहुँच जाने में मदद करता है|

१०. इस में मनोरंजन के गुण भी शामिल है: पढना रोजका काम [उबाऊ काम] नहीं है| हम अधिक मात्रा में पढ़ते हैं क्योंकि उस में मनोरंजन के गुण भी शामिल है – कुछ जरा हटके और सामान्य से अधिक| यह टी.वि. के सामने बैठे रहने से तो बहुत ही ज्यादा बेहतर है! हमारी जिन्दगी की निपुणता को बढ़ाने के साथ साथ पढना हमारा मन भी बहलाता है – और इससे अच्छा सौदा हो ही नहीं सकता!

इतना ले जाओ – उपसंहार में एक नया परिच्छेद लिखने के बदले हमने जैसे शुरू किया था वैसे ही समाप्त करते हैं: – एक उध्दरण (उक्ति) के साथ…

“मैं टेलीविज़न को बहुत ही ज्ञान प्रद मानता हूँ| जब भी कोई इसे चालू करता है, मैं दुसरे कमरे में जा कर पुस्तक पढ़ता हूँ|”

ग्रौचो मार्क्स


Surviving intense painful feelings and emotions is what life is all about. The outcome of such a struggle is in your hands, in fact in your thoughts. Desperation of a sort that makes you want to run away from your problems instead of facing them is risky if cultivated into a habit. This habit is exactly the trigger point of suicidal thoughts. Easier said than done, but start understanding and applying mitigating steps. Learn the importance of a healthier lifestyle. What are the things that are worth holding onto and survive? Focus on those. Here’s how you can start:-


• Origin: Wanting to feel relieved from onset pressures of survival by feeling the need to commit suicide is as absurd as life itself. To survive and live through such weak thoughts, one must understand the origin of such behavioral/thought pattern. Firstly, having mere thoughts and actually executing them are two very different things. What needs to be curbed is the habit of thinking about such a negative concept. The more the importance placed on these thoughts, the greater the magnanimity of negative clouds raging over your life. Be patient with yourself, enough to understand the cause of wanting to resort to such a preposterous measure. Break the pattern of repeatability and apparent-plausibility of these thoughts by finding out the naked truth behind them. Try to understand your inner feelings on a day-to-day basis by keeping a journal. Moreover, it is also important to believe that finding relief is not impossible.

• Get To Discipline Yourself: Discipline comes from thoughts of wanting to take care of oneself by being fully in control. Suicidal thoughts originate from the lack of such nurturing thoughts. Taking care of yourself ranges from keeping a check over alcoholism, drug-addiction, cigarette-consumption to feeding yourself properly, taking a shower regularly to visiting the doctor for regular checkups. It is a wide spectrum. Start to slowly get into the habit of getting in control of yourself first and then your situations. Stop extreme self-policing and self-bullying and start by beginning your day with positive vibrant thoughts. Set up a routine for yourself and make a commitment towards it, every single day!
• Look At The Bigger Picture: Sometimes the cause of our sorrows lie in trivial things. This happens most to people who overthink to the point where they can’t recuperate themselves to normality. The more frequent this habit, the more depressive the mind. This abnormal depression leads to suicidal thoughts. Decide to stop reading in-between the lines and instead look at the bigger picture. Look at things objectively and reason out its importance in the bigger scheme of things instead of getting caught up in mundane details.

• Pour Your Heart Out: Loneliness arises from the absence of another soul who would actually listen to you. However, during suicidal thoughts we insinuate loneliness even though we have a lot of people around us who could willingly help us out and listen to our problems. The more negativity you chain inside yourself, the more it shackles YOU around it. Look beyond yourself to find someone to talk to and pour your heart out. Simple. Free yourself from burdensome thoughts and express yourself to someone else; even if it is a stranger.

• Don’t Carry The Extra Emotional Baggage: Every being carries a certain amount of baggage with him/her and has the audacity to judge the world with his/her limited experience. The past, no matter how difficult, is an impediment to growing your present to its full potential. Chuck it NOW. The past has eloped and nothing can be done about it, but the present is still in your hands to change. Every fleeting moment is monumental in forming a bright future.

• Make A Wish-List: Make a list of all the things you wish to achieve or the kind of person you aspire to be. The only way to curb loneliness is to enjoy your own company; and the only way to achieve that is by achieving your dreams or by at least being active and motivated enough to follow them. Therefore, make a wish-list and put it in a place where you can look at it every day to inspire yourself instead of getting bogged down.

• The Struggle Is Real For Everybody: Everyone you meet is fighting a hard battle. Not everyone wants to quit. Understand that. Study the thought-patterns of highly successful people and also the ones you meet on a daily basis. Understand how they pass through their dark times and what keeps them going. Compare the results to sync them with your own thoughts and feelings; then see if your problems are big enough to compel you to quit.

• Away From Reach: Away from sight, away from mind. Anyone going through a suicidal phase knows that they are vulnerable and anything more negative can trigger extremity. Keep anything unsafe out of reach. No knives, no poison, nothing harmful should be in your vicinity.

• Meditate: Focus on breathing. Meditation helps you to do just that. Bring your attention to your heartbeat by slowly giving in to your breaths. There is nothing more realistically pleasant and soothing than meditation. It helps you understand your inner feelings and helps you deal with your demons internally.

Volunteer: Volunteer on various social platforms for numerous noble causes. It enables your mind to open up to other peoples’ miseries and their way of coping with them despite despair.

• Get Help If Needed: It is not the end of the world. Hardships are as normal as the good times we are offered; and the only way to deal with them is through graciousness. Be gentle on yourself, and if nothing seems to work, getting help is as normal as going to the doctor for a regular physical health check-up!

आत्मघाती विचारों को रोकने के ११ तरीके

अत्यंत कष्टदेय भावनाओं तथा संवेदनाओं को झेलकर जीवित रहने को ही ज़िन्दगी कहते हैं| ऐसी जंग का परिणाम केवल आप के हाथों में ही नहीं, बल्कि आपके विचारों में भी है| किसी भी प्रकार की निराशा, यदि आपको अपनी कठिनाइयों का सामना करने के बजाय, उनसे भाग खड़े होने के लिए प्रेरित करे, तो वह हानिकारक साबित हो सकती है, अगर इसकी आदत डाली जाए तो| ठीक यही आदत आत्मघाती विचारों की शुरुवात होती है| कहना आसान है, पर करना मुश्किल – फिर भी इन्हें समझ कर इनकी गंभीरता कम करने वाले उपाय लागू करना शुरू कर दो| एक अधिक स्वस्थ जीवन शैली का महत्त्व सीख लो| वह कौनसी बातें हैं जिन्हें जकड कर रखा जा सकता है ताकि जिंदगी जी सके? केवल उन्हीं पर अपना ध्यान केन्द्रित करो| आप निम्नोक्त तरीकों से शुरुवात कर सकते हैं:-


• स्रोत: जीवित रहने के आक्रामक क्लेश से छुटकारा पाने के लिए आत्महत्या की ज़रुरत महसूस करना, उतना ही निरर्थक है जितना की जिंदगी| ऐसे निर्बल विचारों में से गुज़र कर जीने के लिए, हमने इस स्वभावजन्य / विचार प्रणाली के स्रोत को समझना चाहिए| प्रथमतः, केवल विचार करना और उन्हें सही में अमल में लाना दो बिलकुल अलग बातें हैं| जिसे रोकना चाहिए वह है ऐसे नकारात्मक धारणा का विचार मन में लाने की आदत| ऐसे बुरे विचारों को जितना ज्यादा महत्त्व दिया जाएगा आपके मन पर मंडराते हुए काले बादलों की विशालता उतनी ज्यदा होगी| खुद के साथ सबर करो, उतना की आप समझ सको की आप इतना बेहूदा व खतरनाक कदम क्यों उठाना चाहते हो| ऐसे विचारों के पीछे के स्पष्ट सत्य को ढूंढ कर, इन विचारों को दोहराए जाने की, और प्रत्यक्ष-सत्याभास की प्रणाली को तोड़ो| एक दैनंदिनी रखकर अपने अंदरूनी विचारों को प्रतिदिन समझने की कोशिश करो| इसके अलावा यह जानना व मानना भी ज़रूरी है की मदद मिलना व राहत पाना नामुमकिन नहीं है|

• खुद को अनुशासित करो: अपना ख्याल रखने के लिए पूरी तरह से खुद पर काबू रखने के विचारों से ही अनुशासन का आरम्भ होता है| आत्मघाती विचार ऐसे पोषक विचारों के अभाव के कारण ही आते हैं| खुद की देखभाल करना अर्थात अत्यधिक मद्यपान, नशीले पदार्थों का सेवन, धूम्रपान करना, आदि पर नियंत्रण रखने के साथ-साथ ठीक से खाना, खुद को साफ़-सुथरा रखना, और नियमित जाँच के लिए डाक्टर से मिलना भी होता है| यह एक विशाल श्रेणी है| पहले धीरे-धीरे खुद पर काबू पाने की कोशिश करो और इसकी आदत डाल लो, और फिर अपने हालात पर काबू पाओ| पराकाष्टा का स्वयं-नियंत्रण और स्वयं-झिडकना बंद करो और खुद के दिन की शुरुवात हकारात्मक व जोशपूर्ण विचारों से करो| खुद के लिए एक दिनचर्या बनाओ और उसके प्रति वचन बध्द बनो, हर रोज़ व रोज़-रोज़!

• बड़े चित्र को देखो: कभी-कभी हमारे दुखों का कारण एकदम मामूली बातों में होता है| ऐसा उन लोगों के साथ अधिक होता है जो हर बात के बारे में बहुत ही ज्यादा सोचते रहते हैं और इसके बाद वे खुद को फिर से स्वाभाविक नहीं बना सकते| यह आदत जितनी बढ़ेगी, उतन ही ज्यादा मन दुखी होगा| यही अस्वाभाविक दुःख आत्मघाती विचारों की ओर ले जाता है| पक्तियों के बीच में पढना बंद करने की ठान कर बड़े चित्र की ओर देखो| हर बात को तटस्थ भाव से देखो और छोटे व तुच्छ अंशों के जंजाल में फंसने के बजाय, बडी योजना में उनका महत्त्व आंक लो|

• अपना दिल खोल के रख दो: अकेलेपन का उद्भव किसी ऐसे हमदर्द के अभाव के कारण होता है जो आपको सच्चे दिल से सुन सके| फिर भी जब आत्मघाती विचार आने लगते हैं तब, बावजूद इसके की हमारे इर्द-गिर्द हमें सुनने वाले काफी लोग हैं, हम अकेलेपन का दावा करते हैं और उसे महसूस भी करते हैं| जितनी ज्यादा नकारात्मकता आप अपने अंदर बंद करके रखोगे वह उतनी ही आपको जकड़ कर रखेगी| खुद से परे, खुद से आगे देखो और ऐसा कोई ढूढों जिसके साथ आप आसानी से व दिल खोल कर बातें कर सकें| बस! खुद को बोझिले विचारों से मुक्त करो और अपनी बात किसीको बताओ; चाहे वह कोई गैर ही क्यों ना हो|

• भावनाओं के अतिरिक्त बोझ को लादे हुए मत रहो: हर व्यक्ति अपने साथ कुछ अतिरिक्त बोझा लादे हुए चलता है और फिर दुनिया को अपने संकुचित अनुभव व नज़रिए से देखने की जुर्रत करता है| आपका अतीत, कितना भी दर्दनाक क्यों ना हो, आपके वर्तमान को पूरी तरह से विकसित होने में बाधा होता है| अतः उसे अभी, इसी वक्त त्याग दो| अतीत बीत गया है और उसके बारे में कोई कुछ नहीं कर सकता, परन्तु वर्तमान को बदल डालना अभी भी आपके ही हाथों में है| गुजरने वाला हर क्षण एक तेजस्वी भविष्य को बनाने में अत्यधिक महत्वपूर्ण होता है|

• एक इच्छा सूची बनाओ: ऐसी बातों की सूची बनाओ जिन्हें आप पाना चाहते हो या फिर यह लिख लो की आप किस प्रकार के इंसान बनना चाहते हो| अकेलेपन का एक ही सच्चा ईलाज है और वह है खुद की सोहबत का मज़ा लेना, और यह करने का एकमात्र तरीका है अपने सपनों को पाना या फिर उन्हें हासिल करने के लिए क्रियाशील तथा प्रेरित होकर जी-जान से जुट जाना| अतः, एक इच्छा सूची बनाओ और उसे ऐसी जगह पर रखो जहाँ आप उसे रोज़ देख सको ताकि, उलझन महसूस करने के बजाय आप खुद को उत्साहित रख सको|

• संघर्ष सबके लिए एक हकीकत है: जिस भी व्यक्ति से आप मिलते हो वह अपनी जंग लड़ रहा है| हर किसीको हार मानने की इच्छा नहीं होती| यह बात समझ लो| अत्यंत कामयाब व्यक्तियों के विचार-ढांचे का और आप रोज़ जिन्हें मिलते हैं उनके विचारो का ठीक से अभ्यास करो| यह लोग अपने मुश्किल दौर से कैसे गुज़रे व बाहर आए यह जानो और वह क्या है जो उन्हें आज भी आगे बढ़ने को प्रेरित करता है उसे समझो| इन परिणामों की तुलना करो और उन्हें अपने विचारों तथा भावनओं से संकलित करो; फिर देखो की क्या आपकी समस्याएँ इतनी बड़ी हैं की वे आपको छुटकारा पाने के लिए मजबूर करें|

• पहुँच के बाहर: दृष्टी से बाहर, दिमाग से बाहर| जो व्यकित आत्मघाती दौरे से गुज़र रहा होता है उसे यह मालूम है की कोई भी नकारात्मक विचार उसे बर्दाश्त की चरम सीमा तक ले जा सकता है| अतः हर खतरनाक वस्तु को पहुँच के बाहर रखो| कोई छुरियाँ नहीं, कोई ज़हर नहीं, कोई भी हानिकारक चीज़ आपके इर्द-गिर्द नहीं होनी चाहिए|

चिंतन करो: साँस लेने पर ध्यान दो| चिंतन आपको ठीक यही करने में मददरूप होता है| धीरे-धीरे अपने साँसों के आधीन हो जाओ और अपनी धडकनों पर अपना ध्यान केन्द्रित करो| चिंतन से बढ़कर सुखकर व शान्तिदेय और कुछ नहीं है| इससे आपको अपने आंतरिक विचारों को समझने में और अपने भीतरी दानवों से जूझने में सहायता होगी|

स्वयंसेवक बनो: अलग-अलग सामाजिक मंचों पर बहुत सारे नेक कार्यों में स्वयंसेवक बनो| इससे आपके मन को दूसरों की समस्याएं और वे लोग उन सब से, निराशा होने के बावजूद, कैसे जूझ रहे हैं यह जानने का मौका मिलता है|
• ज़रूरत पड़े तो मदद लो: यह दुनिया का अंत नहीं है| कठिन समय उतना ही स्वाभाविक हैं जितना अच्छा समय| इससे निपटने का एक ही तरीका है – शालीनता से| खुद के साथ शान्त रहो, और यदि कुछ भी काम ना करे तो, मदद मांगना, डाक्टर के पास शारीरिक जाँच के लिए जाने जितना ही सहज है!

The Secret To Happiness

Being happy is easier than one might think. It is no rocket science and in fact is a lot simpler than we perceive it to be. It is a state of mind that makes one feel content on a regular basis. Evidently, it is something that you have control over and is not dictated by the circumstances you live in. It is an extremely basic need to build an incredible life.

Boil Down To The Basics

“I think everybody should get rich and famous and do everything they ever dreamed of so they can see that it’s not the answer.” – Jim Carrey

 Money or fame does not validate the existence of a happy life. Additionally, striving to gain more of it does not guarantee happiness either! Sure it can give you momentary satisfaction but it definitely does not provide a perpetually-happy state of mind. Happiness lies in the most simple and basic things. It is about living in the present rather than daydreaming about a golden future. It is about finding perfection in the most imperfect things. It is about consciously choosing to be positive amidst our negative circumstances. It is about appreciating the small efforts instead of voluntarily looking for faults. It is a lateral shift in the mind towards valuing the basics.

Learn To Be Childlike

“You can be childlike without being childish. A child always wants to have fun. Ask yourself, ‘Am I having fun?” –  Christopher Meloni

 Awaken the innocence within you and be childlike sometimes. Drop looking for evaluating the pros and cons of every situation and allow your heart to do what it wants even if it seems silly. Have fun, period. At home, at work, at a shopping mall, while doing chores; no matter what and where, just have fun! Life is not given to you so that you can weigh the good or bad, lay judgement or criticise others. So learn to be like a child and accept people and situations as they are and have the time of your life irrespective! Learn to make friends of strangers, find happiness in the most ordinary of circumstances and distance yourself from that critical mind.

Stop Overthinking

“We are dying from overthinking. We are slowly killing ourselves by thinking about everything. Think. Think. Think. You can never trust the human mind anyway. It’s a death trap.” – Anthony Hopkins

Once we see that we are not where we would like to be in our lives, we start overthinking. We start being extremely restless and negative and begin to analyse make-believe situations in our heads. As a result, we are overtly critical not just with ourselves but also with others. We start to make drastic changes that are uncalled for and slowly become victims to our situations instead of rising above them. So ditch the overthinking and cultivate positive thoughts. Focus on good, inspiring thoughts. Listen to your heart while despairing and look back at times when you persevered irrespective of having negative people/situations around you. Put up a worthy fight and enjoy while you’re at it! Calm your mind using meditation and practice positivity every single moment without fail!

Realign Your Value System

“If the only prayer you ever say in your entire life is thank you, it will be enough.” – Meister Eckhart

Be thankful for everything and everyone. Count your blessings. Realign your value system to positivity and the only way to do that is by being grateful. Appreciate the roof over your head,

the air you breathe, the food you eat, your family, your friends, your colleagues, your work, the negative situations for having taught you to be a bigger person, the resources you are being provided; just everything! And make sure it is sincere and heartfelt. It teaches you to be humble, makes you value hard work and see the good in everything.

Have A Sense Of Humour

“Why so serious?” – The Joker (The Dark Knight)

Stop taking things seriously and build a sense of humor. Learn to laugh at yourself and let go of that ego! It is the most liberating thing to do. We get so caught up in the morbid things in life that we forget to have a good laugh. There’s so much that can give us joy amongst all the seriousness. Not just that, it helps us to take things easy. So laugh it off!

Be Giving and Forgiving

“The weak can never forgive. Forgiveness is the attribute of the strong.” –  Mahatma Gandhi


Be forgiving and giving. Stop holding grudges. It will be harsher to you than someone else in the long-term and you can surely live without such a burden. Know that everyone makes mistakes and it is okay to forgive and forget. To let go is the first step towards a happy life. Feel lighter and learn to give and help everyone. Help the less fortunate; it’ll let you see life with a very different perspective.


“Exercise is really important to me – it’s therapeutic. So if I’m ever feeling tense or stressed or like I’m about to have a meltdown, I’ll put on my iPod and head to the gym or out on a bike ride along Lake Michigan with the girls.” –  Michelle Obama

Draw yourself into a healthy regimen. Exercising gives you control and helps in relieving stress. It makes you feel good about yourself leading to a sense of self-importance. It gives you a sense of purpose and higher self-esteem because you actively take control of improving yourself.

Also, physical well-being automatically leads to mental well-being. It helps you practice restraint over unnecessary thoughts and build a positive outlook towards life.

So go out there keeping the above in mind and remind yourself daily of why it is so important to be happy above and beyond anything else!

खुशियों (सुख)  का राज़ 

खुश होना आप सोचते हैं उससे कई गुना आसान है| यह कोई गहरा विज्ञान नहीं है और हमें लगता है उससे कई ज्यादा सहज है| यह मन की एक स्थिति है जो हमें नियमित रूप से संतुष्ट होने का एहसास कराता हैं| अतः, ज़ाहिर है कि यह केवल आप ही के हाथ में है नाकि  आप किस परिस्थिति में जी रहे हैं उस पर| एक अविश्वसनीय जीवन की रचना करने के लिए यह निहायत ही बुनियादी ज़रुरत है|

बुनियादों पर लौट आओ

“मैं सोचता हूँ की सबने अमीर और प्रसिध्द बनना चाहिए ताकि वे वह सब कुछ कर सकें जिसका सपना उन्होंने देखा हो जिससे उन्हें पता चलेगा की यह किसी भी प्रश्न का उत्तर नहीं है| – जिम कैरी

पैसा या प्रसिध्दी सुखी जीवन का प्रमाण नहीं होते| और फिर, इन दोनों को अधिकतर हासिल करना भी खुशियों की गारंटी नहीं देता! यकीनन यह आपको क्षणिक संतुष्टि देगा परन्तु यह उस हमेशा-खुश स्थिति को उपलब्ध नहीं कराता| सुख एकदम साधारण तथा बुनियादी बातों में पाया जाता है| यह वर्तमान में जीने के बारे में है नाकि सुनहरी भविष्य के बारे में दिवास्वप्न देखना| यह सबसे त्रुटिपूर्ण वस्तुओं में से उत्कृष्टता खोज निकालने के बारे में है| यह हर नकारात्मक परिस्थिति को जानते हुए भी अपने पूरे होशहवास से सकारात्मक रवैया अपनाने के बारे में है| यह हर छोटी कोशिश की प्रशंसा करने के बारे में है नाकि स्वेच्छापूर्वक दोष ढूढना| यह मन की बुनियादों को बहुमूल्य मानने की ओर एक गौण तबदीली है|

शिशु सुलभ बनना सीखो

“आप बचकाना हुए बिना शिशु सुलभ हो सकते हैं| एक बालक को हमेशा खेल-मज़ाक करना होता है| खुद से सवाल करो, ‘क्या मुझे मज़ा आ रहा है?’ – क्रिस्टोफर मेलोनी

अपने अन्दर की मासूमियत को जगाइए और कभी कभी शिशुवत बन जाइए| हर परिस्थिति की अच्छाइयों व बुराइयों का मूल्यांकन करना छोड़कर अपने दिल को वही करने दीजिए जो वह करना चाहता है, चाहे फिर वह मूर्खता ही क्यों ना लगे| मज़ा कीजिये, बस| घर में, दफ्तर में, खरीदी करते वक्त, छोटे-मोटे काम करते समय; कहीं पर भी हो व किसी भी हालात में हो – बस मज़ा कीजिए! आपको जीवन इसलिए नहीं मिला है की आप अच्छे-बुरे की तुलना कर सकें, अपना मंतव्य दे सकें, या दूसरों की आलोचना कर सकें| अतः शिशु सुलभ होना सीखिए और लोगों व परिस्थितियों को वह जैसे हैं वैसे ही उन्हें अपनाना सीखें और अपने जीवन का सबसे बेहतरीन समय बीताइए, चाहे कुछ भी हो! अनजान लोगों से दोस्ती करना सीखो, सबसे मामूली परिस्थिति में ख़ुशी ढूँढिए और खुद को उस आलोचना करने वाले मन से दूर रखिए|

अत्यधिक सोचना बन्द कीजिए

हम अत्यधिक सोच से मर रहे हैं| हर चीज़ के बारे में सोच-सोच कर हम खुद को धीरे-धीरे मार रहे हैं| सोचो| सोचो| सोचो| वैसे भी हम मानव मन का कभी भी विशवास नहीं कर सकते| यह एक मौत का शिकंजा है|” – अन्थोनी हॉपकिंस

जैसे ही हम देखते हैं की हम अपने जीवन में जहाँ होना चाहते थे वहाँ नहीं हैं, हम अत्यधिक सोचने लगते हैं| हम एकदम बेचैन तथा नकारात्मक होने लगते हैं और अपने दिमाग में काल्पनिक अवस्थाओं का पृथक्करण करने लगते हैं| फलस्वरूप हम ना केवल खुद की बल्कि दोसरों की भी बहुत ज्यादा आलोचना करने लगते हैं| जो बिल्कुल ज़रूरी नहीं हैं ऐसी  खतरनाक तबदीलियाँ हम करने लगते हैं और परिस्थिति से ऊपर उठने के बजाय अपनी ही बनाई हुई अवस्थाओं के शिकार बन जाते हैं| अतः बहुत ज्यादा सोचने की आदत को त्याग दो और सकारात्मक विचार बढ़ाओ| अच्छे, प्रेरणात्मक विचारों पर ध्यान दीजिए| जब अधिक निराश हों तब अपने दिल की सुनिए और उस समय का विचार कीजिए जब अपने इर्दगिर्द नकारात्मक लोगों / अवस्थाओं के बावजूद आप डटे रहे थे| ____ (अच्छी) जंग लड़िये और ओके हर पल का मज़ा लीजिए! चिंतन से अपने मन को शांत कीजिए और भूले बगैर हर पल सकारात्मकता से विचार कीजिए|

अपनी नीति का पूनर्निर्मान को

“यदि अपने जीवन में आपने केवल एक ही प्रार्थना की – धन्यवाद – तो यह काफी होगी|” – मिस्टर एकहार्ट

हर एक व्यक्ति व वस्तु के लिए आभारी बनो| अपने वरदान गिनो| अपनी नीति का हकारात्म्कता की ओर पूनर्निर्मान कीजिये और यह करने का एकमात्र तरीका है कृतज्ञ होना| अपने सर के ऊपर के छत की, जिस हवा में आप साँस लेते हो उसकी, जो खाना आप खाते हो उसकी, अपने परिवार की, अपने मित्रों की, अपने सहकर्मचारियों की, अपने काम की, आपको बेहतर व्यक्ति बनाने के लिए उन नकारात्मक अवस्थाओं की, जो संसाधन आपके प्राप्त हो रहे हैं उनकी, अर्थात हर एक वस्तु की सराहना कीजिए| और सुनिश्चित करो की यह सच्चे दिल से व पूरी इमानदारी से हो| यह आपको नम्र बनना सिखाता है, अपनी कड़ी मेहनत की आदर करना सिखाता है, और हर चीज़ में कुछ अच्छा देखना सिखाता है|

विनोदिता होनी ज़रूरी है

“इतने गम्भीर क्यों?” – द जोकर (द डार्क नाईट)

हर बात को गंभीरता से लेना छोडिये और अपनी विनोदिता विक्सित कीजिये| खुद पर हँसना सीखो और उस अहंकार को जाने दो| यह सबसे मुक्त करने वाली बात है| हम जीवन की दूषित बातों में इतने ज्यादा जकड जाते हैं कि हम खुल के हँसना भूल जाते हैं| इस सारे गंभीरता के बीच बहुत कुछ है जो हमें काफी ख़ुशी दे सकता है| केवल यही नहीं, यह हमें हर बात को आसानी से झेलने में मदद करता है| तो उसे हँसी में उड़ा दो|

दानी व क्षमाशील बनो

“कमज़ोर व्यक्ति कभी माफ़ नहीं कर सकता| क्षमाशीलता ताकतवर का गुण है|” – महात्मा गांधी


दानी व क्षमाशील बनो| दुर्भाव संभालना बंद कर दो| लम्बे अर्से में किसी और के बजाय, यह आपको ही ज्यादा नुकसानदेय साबित होगा और यकीनन आप इस बोझ के बगैर रह सकते हो| छोड़ देना या जाने देना, सुखी जीवन की ओर का पहला कदम है| अधिक हल्का महसूस करो और सबको देना और मदद करना सीखो| कम नसीबदार वालों की मदद कीजिये; यह आपको ज़िन्दगी को नए नज़रिए से देखने देगा|


मेरे लिए कसरत बहुत महत्वपूर्ण है – यह शांतिदायक है| इसलिए जब भी में तनाव या दबाव महसूस करती हूँ या मुझे बहुत ज्यादा गुस्सा आया हो, तो मैं अपना आई-पोड लगाती हूँ और व्यायामशाला में चली जाती हूँ या अपनी बेटियों के साथ मोटर साईकिल पर मिशिगन तालाब के किनारे पर एक लम्बी सैर के लिए चली जाती हूँ|” – मिशेल ओबामा

अपने आप को एक स्वास्थ्यपूर्ण आहार नियम में ढालो| कसरत से आप नियंत्रण पा सकते हैं और यह तनाव को हल्का करने में मदद करता है| यह आपको खुद के बारे में अच्छा महसूस कराता है जिससे आपको स्वाभिमान का एहसास होगा| यह आपको एक लक्ष्य की तथा एक उच्चतर स्वाभिमान की अनुभूति कराता है क्योंकि आप सक्रियता से अपने आप को सुधारने का ज़िम्मा लेते हैं| साथ ही, शारीरिक स्वास्थ्य अपने आप ही मानसिक स्वास्थ्य की ओर ले जाता है| इससे आपको अनावश्यक विचारों पर काबू पाने में मदद मिलती है और ज़िन्दगी की ओर एक हकारात्मक रवैया बनाने में भी सहायता मिलती है|

तो बाहर निकालिए और उपरोक्त सभी मुद्दों को ध्यान में रखते हुए अपने आप को याद दिलाइये की हर एक बात से बढ़कर खुश रहना क्यों सबसे महत्वपूर्ण है|