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First things First – if you are reading this, it is an all-assuming that you agree that thoughts are things and understand the omnipotence of our thoughts in our lives.

Everyone, no matter how minimalistic, is not as detached as they believe themselves to be. We are all, at some level, slaves to our own thoughts. It is not possible for us to switch off our minds and work like robots – and, to our abysmal disappointment, that in fact is the exciting part! Do you see the empty thought-bubble above? You can fill it with anything you want consciously and bring about either miraculous or appalling changes!

We think perpetually. To realize that you’re not thinking at all is also a thought. Thinking is almost involuntary but what can be voluntarily changed in order to change our lives is to think
positively and to exercise controlling own thoughts to get exactly what you want in life (and not the other way around!).

For this it is important to understand the difference between thinking and over-thinking. Anything unproductive and worrisome that arises in your life is due to over-thinking (which is more often than not a negative connotation which works in contrast to bringing about a happy change; and is associated more with victimizing oneself). We get a thought, and then another one, and then another one, and it is a continuous process. Over-thinking keeps you awake at night, it is more destructive than constructive, it leads you to a state of fear for the unknown; it is repetitive, distorted, intrusive and downright NEGATIVE. Needless to say it impacts your results, success and performance. However, the good news is that there’s a fine line between thinking and overthinking and it’s just a flick of perspective.Read on:-

1. Cheat-Sheet: If it were so easy to stop the pessimistic overthinking, all of us would have successfully changed the habit. But the idea is utopian to us. Although we can weave a cheat-sheet around it and redeem ourselves. The concept of the cheat-sheet is a distraction that you create for yourself to disassociate your mind from the filthy habit. Send a command to your mind – not in the form of words but actions! Our mind perceives actions/pictures more than vague words. Find your personalized distraction. It can vary from talking to a friend, doing a particular activity with your family/loved ones, eating your favorite cuisine (albeit not stress-eating), watching your favorite movie, listening to your favorite song/music, reading a book; literally ANYTHING!, Anything that reminds you to think better and feel better; just make sure it is dynamic. In Sneh Desai’s Signature Workshop ‘CHANGE YOUR LIFE’, all the participants, who make this detailed list, get astonishing results. If nothing works, revisit this blog-post!

2. Positive Affirmations: While you’re on your cheat-sheet working slowly at altering your mind-frequency from auto-tune to manual, give yourself positive affirmations. It is not necessarily just reiterating positive anecdotes or quotes in your head but could just be training yourself, at your most vulnerable, to enjoy your distracting activity with utmost attentiveness.

3. Patience: Once you’re at the stage of familiarizing yourself to get accustomed to positive-affirmations learn to be patient. Be patient with yourself. It is almost a self-tolerance test. Change is the only constant, but bringing about a positive one tests your self-control and patience. Don’t fail yourself and keep reminding yourself why it is important to not fall back into the pit of overthinking.

4. If The Worst Happens: Worst case scenario, if you do fall back into the pit, get back up without guilt/negativity. We are allowed to make mistakes but it is more important to accept and learn from it. The next time your thoughts go haywire make sure you take this one example of yours and remind yourself of the consequences to not repeat it.

5. Don’t Be A Perfectionist: Changing your thoughts is a task. A long-term one at that! One who has enough courage to muster to take responsibility should not be a perfectionist. Why you ask? Perfectionism is an obsessive behavior which demands a lot more of you when you’re most unprepared. How absurd is that? For a perfectionist it gets very difficult to accept defeat and then do something about it. And there should not be anything to make you feel dejected. On the flip side of this extremism is also the fact that if a perfectionist does something even remotely positive he/she shall be too overwhelmed and then lose focus quickly. As a result, positive thoughts go down the drain. Avoid such extremism, and be strategically dynamic.

6. Laugh, Laugh, Laugh!: Don’t take yourself too seriously. Laughter is the best medicine. When despondency takes over, laugh it off. It’s the simplest form of positive change. Plus, laughing at your own self with slight self-deprecation is liberating!

अपने विचारों को काबू में रखने के उपाय !

सबसे पहेला काम – अगर आप यह पढ़ रहे हैं, तो यह सब मान लेते हैं की आप सहमत हो की विचार वस्तु है और समझते है की विचार हमारे जीवन में सर्व शक्तिमान है|

हर व्यक्ति, फिर वह चाहे कितना भी अल्पतम क्यों न हो, उतना निरासक्त नहीं है जितना वह मानता है| हम सब किसी न किसी स्तर पर, अपने ही विचारों के गुलाम है| हमारे लिए यह संभव नहीं है की हम हमारे दिमाग को बंद कर दें और यन्त्र मानव की तरह काम करें – और हमारी अगाध मायूसी के बावजूद, हकीकत यह है की यही तो उत्तेजक भाग है! क्या आप विचारों का रिक्त बुलबुला ऊपर देख सकते हो? आप उस में अपने पूरे होशहवास के साथ कुछ भी भर सकते हो और चमत्कारिक या डरावना बदलाव ला सकते हो!

हम निरंतर सोचा करते है| ये अहेसास होना की हम कुछ भी नहीं सोचते है यह भी तो एक विचार ही है| सोचना ज्यादातर अनैच्छिक होता है, लेकिन हमारे जीवन में बदलाव लाने के लिए, ऐच्छिक रूप से जो बदला जा सकता है वह है सकारात्मक तरह से सोचना और अपने विचारों पर नियंत्रण ला कर हमें जो चाहिए उसे पाना [नाकि इससे विपरीत!]|

इसे समझने के लिए यह जरुरी है की हम ‘सोचने’ और ‘जरूरत से ज्यादा सोचने’ में का फर्क जाने| आपकी जिन्दगी में किसी भी अनुत्पादक और चिंताजनक बात का उद्भव होता है वह इसी ‘जरूरत से ज्यादा सोचने’ के कारण होता है [जो अधिकतर बार एक नकारात्मक संकेतार्थ ही है जो अच्छा बदलाव लाने की विपरीत दिशा में काम करता है, और खुद पर अत्याचार करने के साथ जुड़ा हुआ है|] हमें एक विचार आता है, फिर और एक आता है, और फिर एक और आता है और यह प्रक्रिया अविरत चलती ही रहती है| जरूरत से ज्यादा सोचना आपको रातको सोने नहीं देता, यह रचनात्मक होने के बजाय विनाशकारी होता है, यह आपको किसी अनजाने भय की ओर ले जाता है; ऐसा बार बार होता है, यह विकृत होता है, हस्तक्षेप करने वाला होता है, और पूरी तरह से नकारात्मक होता है| यह कहेना जरुरी नहीं है की इसका असर आपके परिणाम, सफलता और प्रदर्शन पर पड़ता है| कुछ जाना-पहचाना लगा? फिर भी, अच्छी खबर यह है की, ‘सोचने’ व ‘जरूरत से ज्यादा सोचने’ के बीच एक महीन रेखा है, और यह केवल दृष्टिकोण का हल्का सा झटका ही है| आगे पढ़ें:-

१. वंचक पत्र: अगर निराशावादी विचार करना बंद करना इतना आसान होता तो हम सबने सफलतापूर्वक यह आदत बदल दी होती| पर यह विचार हमारे लिए काल्पनिक है| फिर भी हम इसके इर्दगिर्द एक छोटे से वंचक पत्र को बुन कर अपने आप को इससे मुक्ति दिला सकते हैं| वंचक पत्र की धारणा के पीछे सिद्धांत यह है की आप खुद के लिए दूसरी ओर लगाव पैदा करें ताकि उस गंदी आदत से अपने मन को मुक्त कर सकें| अपने दिमाग को आदेश कीजिए – शब्दों के रूप में नहीं पर कार्य के रूप में| हमारा दिमाग अस्पष्ट शब्दों के बदले कार्य / चित्र को ज्यादा समझता है| आप अपना ध्यान खींचने वाली निजी प्रवृत्ति को ढूंढिए| यह कुछ भी हो सकती है जैसे की किसी दोस्त से बात करना, अपने परिवार के सदस्य या चाहने वालों के साथ कुछ प्रवृत्ति करना, आपकी पसंदीदा चीजें खाना [परन्तु तनाव के कारण खाना नहीं], पसंदीदा चलचित्र देखना, पसंदीदा गाने या संगीत सुनना, कोई पुस्तक पढना; अक्षरशः कुछ भी! कुछ भी जो आपको अच्छे विचार करने की व अच्छा महसूस करने की याद दिलाये; बस इतना ध्यान रहे की वह सक्रिय हो| स्नेह देसाईं की सिग्नेचर वर्क शॉप ‘चेंज योर लाइफ’ में सारे सहभागी जो ऐसी विस्तृत सूचि तैयार करते है उन्हें आश्चर्यजनक परिणाम मिलते हैं| अगर कुछ भी काम ना करे, तो इस वेबदैनिकी (ब्लॉग पोस्ट) को फिर से देखिए|

२. सकारात्मक प्रतिज्ञा: जब आप अपने वंचक पत्र के साथ अपने मन को धीरे धीरे स्वसंगति से हस्तचालित में परिवर्तित कर रहे हो तब अपने आप को हकारात्मक प्रतिज्ञाएँ दीजिये| यह जरूरी नहीं की यह केवल अपने दिमाग में स्थित हकारात्मक किस्से या उध्दरण हो, पर जब आप खुद को सबसे कमजोर पायें तब उस दूसरी ओर ध्यान खींचने वाली प्रवृत्ति का मज़ा ले सकें यह प्रशिक्षण खुद को दें|

३. धीरज/सब्र: एक बार आप परिचित हो कर उस मंजिल पर पहुंच जाते हैं जहाँ आप हकारात्मक प्रतिज्ञा के आदि बन जाते हैं तब धैर्यवान बनना सिखें| खुद के साथ धीरज रखना सीखो| यह खुद की सहनशक्ति जांचने की परीक्षा है| केवल बदलाव ही कायम है, लेकिन सकारात्मक परिवर्तन लाना आपके धैर्य और आत्मसंयम की कसौटी है| अपने आपको असफल मत होने दो और अपने आपको याद दिलाते रहो की क्यों ‘जरूरत से ज्यादा सोचने’ के खड्डे में फिरसे गिरना नहीं है|

४. अगर अत्यंत बुरा होता है तो: बुरे कथानक की स्थिति में, अगर आप गढ्ढे में गिरते ही हो तो, बिना किसी दोषी या नकारात्मक भावना के फिरसे खड़े हो जाओ| हमें गलती करने की आज़ादी है, पर ज्यादा जरुरी यह है की हम उसका स्वीकार करें और उससे सीखें| अगली बार जब आपके विचार गड़बड़ करें तो खुद का उदाहरण और उसके बुरे नतीजे याद करो और अपने आप को याद दिलाओ और उसे (उसे बुरी आदत को) दुबारा न दोहराएँ|

५. पूर्णतावादी मत बनो: विचारों को बदलना एक कठिन कार्य है| और ऊपर से एक लम्बी अवधि का! जिसमें भी ज़िम्मेदारी लेने का जरूरी साहस हो उसे पूर्णतावादी नहीं बनना चाहिए| क्यों? आप पूछेंगे| पूर्णतावाद एक सनकी आचरण है जो आप से, तब बहुत ज्यादा की अपेक्षा करता है, जब आप बिल्कुल तैयार नहीं होते| यह कितना अजीब है? पूर्णतावादी के लिए हार स्वीकार करके उसके बारे में कुछ करना बहुत ही कठिन होता है| और आप निराशा महसूस करें ऐसा कुछ भी नहीं होना चाहिए| इस अतिवाद का दूसरा पहलू यह भी है की यदि एक पूर्णतावादी इंसान कुछ थोडासा भी हकारात्मक करे तो वह इतना/इतनी ज्यादा विव्हल हो जाएगा/जाएगी की वह शीघ्र ही अपना केन्द्र-बिंदु भूल जायेगा/जाएगी| परिणाम स्वरूप हकारात्मक विचार नाले में बह जाते हैं| ऐसे अतिवाद से दूर रहो, और युक्तिपूर्वक तरह से सक्रिय बनो|

६. हँसो, हँसो, हँसो!: अपने आपको ज्यादा गंभीरता से मत लो| हँसना सबसे बेहतरीन दवा है| जब मायूसी छा जाये, तब उसे हंसी में उड़ा दो| हकारात्मक बदलाव का यह सबसे सरल-सहज तरीका है| और फिर, खुदकी थोड़ी निंदा के साथ खुद पर हँसना मुक्ति दिलाता है!

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